अभिनव थियेटर जम्मू,
बलवंत ठाकुर का लिखा व निर्देशित डोगरी नाटक ‘घुमई’.. जुबां की आंख नही आंख बेजुबां मेरी .. श्री ठाकुर और
उनकी टीम को बधाई।
कुछ अच्छा लगे तो एक
‘क्यों’ भी जाग जाती है। ‘घुमई’ की
‘क्यों’ में पहला आकर्षण ‘पहाड़’ है।
विस्थापन के चलते पिछले वर्षों में, पहाड़ को न जी पाने की कचोट, इस आकर्षण को घना करती गई... इसी
कारण अपने लिखने में पहाड़ को कई अर्थों में खुला पाता हूं। ‘घुमई’ ने इन अर्थों को नए आयाम दिए हैं।
कहानी में पहाड़ी
लोक जीवन के यथार्थ की प्रस्तुति में एक हल्की सी विसंगति दिखी। शायद, मेरी नज़र का धोखा हो... पहाड़ी जीवन के अपने
समृद्ध व संचित अनुभव हैं। जिनके चलते वे अपनी जरूरतों और पहाड़ के व्याकरण में
सामंजस्य बिठा कर ही जीवन जीते हैं। ..अपवाद रूप, कभी हो सकता है ..ऐसी महत्वपूर्ण
यात्रा जिसमें दुल्हन घर लाई जा रही हो... उसमें पानी के प्रबंध की चूक हो गई हो।
कुछ भी हो, नाटककार ने प्यास, पहाड़ और आदमी
के त्रिकोण से कुछ ऐसा रचा है, जो
गहरे में चुमता है।
प्यास तो नैसर्गिक
है, इसे कहां तक रोकिएगा ..पहाड़ की जटिलता, आदमी
की विवशता ...युधिष्ठर भी द्रौपदी हार जाते हैं। ...यह तो सीधा-सादा भोला सा पहाडी़
दूल्हा है। विवशता से उपजी चूक, चूक से उपजी विवशता, उस
त्याग को भी तो संकेतित करती है, जो इस प्यास की निवृति में किसी भी सीमा तक जाने
को उद्यत है...। दुल्हन की प्यास मिटे, इसके एवज में, दुल्हन
ही देने को तैयार हो गया।
लेकिन, इस
सारी स्थिति से उपजी प्रयत्न की बाध्यता, सहज मानवीय करूणा से प्रेरित कर्म
को लांघ कर परिणाम प्रेरित जुआ क्यों बनी? उस युवक के साहस, पहाड़
और प्यास से जा टकराने के साहस को, (यह भी ध्यान में रखते हुए कि उसकी शारीरिक क्षमता दूल्हे से बेहतर रही होगी) कम करके नही
आंक रहा ...इसके मूल में निश्चित ही सहज मानवीय करूणा की प्रेरणा है। लेकिन,
जब इसमें व्यक्तिगत स्वार्थ की फलाकांक्षा; दुल्हन को प्राप्त कर लेने का स्वार्थ जुड़ा,
तो इस प्रेरणा का सौंदर्य, उसका
प्रभाव तो धूमिल हुआ...!
मान लो, पानी लेकर आनेवाला पात्र नही मरता.. तब क्या
स्थिति थी ?
जटिल है....जटिल है
कोई निर्णय दे पाना ! शायद, इस जटिलता से बचने के प्रयास में, नायक को मृत्युदान दे दिया गया है।
जो भी हो, कहानी में एक मौसम है, जो कभी भी, किसी भी करवट निर्णय ले सकता है...यही इसका सौंदर्य है।
वैसे भी नाटक में
घटनाएं रसरंग से सराबोर है। नाटक का निर्देशन कमाल का था। अमूर्त का मूर्तन,
निर्देशन में विलक्षण प्रतिभा की मांग
करता है। विश्वास ही नही होता, जम्मू
में ठीक हमारे बीच, ऐसी विलक्षण
प्रतिभा भी है! लगता है जैसे निर्देशक, इंच-इंच कहानी को जिया हो। एक-एक
अभिव्यक्ति इतनी सघन, इतनी
सूक्ष्म, इतनी सशक्त, इतना
तरंगित करनेवाली .. प्यास जैसे सजीव हो उठी। दुल्हन प्यास हो उठी, दूल्हा प्यास हो गया, बराती-कहार, पहाड़, सब प्यास हो गए। यहां तक की दर्शक प्यास हो गया। प्यास और उसकी
तृप्ति की आकांक्षा लहराती हुई दर्शक के भीतर तक उतर गई। दर्शक बिना चाहे भी इस
प्यास के साथ एकात्म हो उठता है।
मेरे सामने तो कंडी
सजीव हो उठी। एक पहाड़न, अपने गधे के दोनों और दो मिल्ट्री कैन लटकाए, अपने दो बच्चों के साथ पहाड़ी उतर रही हैं;
तीन चार घंटे का सफर तय करते हुए चालीस लीटर
पानी घर ले जा रही है। शुआपाटा, दब्बड, भेड़ा, कंडी के गावों
में आज भी यह दृश्य मिलते हैं। बेशक, राज्य के पेयजल विकास मंत्री अपने नाम के साथ ‘सागर’ चिपका
कर रखते हों। पर मैं तो अपने नाम से ‘सागर’ हटा रहा हूँ (चिढ़ होने लगी है) ...विचलन के लिए क्षमा,
पर जरूरी लगा यह सब कहना।
मंच का प्रकाश
प्रबंध अद्भुत था... दिन सांझ में सरकता हुआ, सांझ रात में ढलती हुई ..रात फिर सूरज को खाली मटके सा
सिर पर रख कर मूर्त प्यास के इस अंतहीन सफर को तय करती हुई। ....और वो डुग्गर
गीतों का पार्श्व-गायन, शब्द;
अर्थो की सारी सीमाएं लांघ, लहर बन छाए रहे ... हर पात्र .. हर पात्र अपना
प्रभाव दे गया।
पहले लगा नाटक का
अंत कुछ अस्वाभाविक है। फिर लगा हम जो
जीवन जीते है उसमें स्वाभाविकता है ही कहां ? शायद पृष्ठभूमि पहाड़ की न होती तो नायिका के विद्रोह
का कोई अर्थ था। लेकिन, पहाड़ की
पृष्ठभूमि में नायिका का विद्रोह ?
फिर भी कहूंगा
...जुबां की आंख नहीं आंख बे जुबां मेरी
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