सोमवार, 2 दिसंबर 2013

फलो फूलो ओ पृथ्वी


शायद
यह पृथ्वी
मरू की अनंतता में
जीवन की आहट है

शायद
किसी और सौरमंडल के
किसी ग्रह उपग्रह को
मेरी प्रतीक्षा है

शायद
किसी दिन
हरा भरा होगा ब्रह्मांड

फलो फूलो ओ पृथ्वी


2 दिसम्बर 2009

प्यार



क्या प्यार हीरा है
इतना चमकदार
इतना कठोर

आखिर तो
कालिख से ही
जन्म लेता है

इससे
और अधिक
क्या उम्मीद
की जा सकती है

विलोम भाव

मैं आदमी
भले ही गाता रहूँ
अपनी महानता के गीत
पर सच यह है कि मैं
जीवन, प्यार,
ईश्वर और स्वतंत्रता का
विलोम भाव हूँ

कितना कितना रक्तपात
कितना अश्रुपात किया है
करवाया है मैंने
फिर भी 
यह धरती सहे जाती है
सूर्य दिए जाता है मुझे जीवन

सभ्य हो पाने की संभावना
बार बार टकराती है मुझसे
लौट लौट जाती है
इस गूँज के साथ
नहीं! अभी नहीं

मैं आदमी
भले ही गाता रहूँ
अपनी महानता के गीत
पर सच यह है .. मैं
जीवन, प्यार,
ईश्वर और स्वतंत्रता का
विलोम भाव हूँ

लौटते हुए

अब जब 
आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द की  
शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ 
वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण 
करती चली गई

ताकि लौट कर 
कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
और 
जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए

ताकि 
प्यार, प्यार हो
न कि बंधन

ईश्वर 
ईश्वर हो
न कि जड़ों तक 
उतरा हुआ डर

स्वतंत्रता 
स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और
 कानून के मछुआरे जाल


ताकि 
जीवन, जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल

हम तो आदमी हैं

जिंदगी जब 
सिद्धांतों और आदर्शों में 
अटक जाती है 


किताबों और उद्धेश्यों में 
भटक  जाती है


 जिंदगी तब ..
जिंदगी नहीं 
गुलामी बन जाती है


गुलामी !  
आप जानते हैं 
पशुओं को भी स्वीकार्य नहीं 
हम तो आदमी हैं

मैं और मेरा समय

मैं और मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी तमाम कमजोरियों के साथ 

मैं और मेरा मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी पूरी ताकत के साथ 

मैं और मेरा समय 
क्या कभी दोस्त बन सकते हैं

याद





यह किन 
ख्यालों की भट्ठी में 
खुद को जला रहा हूँ 
यह रात यह तन्हाई 
और 
उस बेवफा की याद 
१३-७-२००५

कहाँ तक

ओ मेरी 
महत्वाकांक्षाओं
ओजोन की परतें भी फट चुकीं 
चन्द्र, मंगल, बुध 
सब छूटे पीछे 
सूर्य भी किया पार 
कहाँ  तक ले जाओगी  मुझे 
कहाँ तक.. कहाँ तक.. कहाँ तक  
५.८.२००४

लोकतंत्र

 

नहीं !
कोई जुआ नहीं ! 
तुमनें इनकार किया 

शाबाश !
उन्होनें थपथपाई तुम्हारी पीठ  
यही है क्रान्ति' 

हकूमत के हक में तो
हम भी नहीं 

पर 
तुम्हारे भले के लिए
कुछ तो चाहिए 
(तुम्हें जुतना है 
हमें करनी है सवारी)

ऐसा करो 
तुम चुनो "हमें"
हमारी शर्तों के साथ

और 
बड़ी शान के साथ 
वे लंगड़े लोकतंत्र का 
तांगा चला रहे हैं 

दुश्मन

धीरे धीरे 
दोनों मेरे ... हो गये 
एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में 
एक उड़ान भरने को खुले 
दूसरा हिले भी नहीं 
एक दुसरे को लताड़ते फटकारते 
उन्होनें गवां दी उम्र 
और 
सम्भावनाओं के आकाश को 
देखता ताकता 
मैं जमीन हुआ 

क्या हम जीवित हैं

जिसे भी पूछा 
उसी ने खोली दुखों की पोटली 
जहां भी गया वहीं पाया 
अनजान चौराहा 
हर आँख में 
इक याचक देखा 
हर आत्मा जैसे भिक्षा-पात्र 
कहानिया भूल चुका हूँ 
भूल चुका हूँ गीत प्यार के 
नृत्य भी खो चुका कब का 
क्या मैं जीवित हूँ 
क्या हम जीवित हैं

दिन

क्या  बड़ा  क्या  छोटा  दिन

क्या  आता  क्या  जाता  दिन 
खेल  तमाशा  बच्चों  का  है
ये  बहलाता  फुसलाता  दिन

मेरे बाद

 





नहीं जानता 
क्या होगा 
मेरी कविताओं का हाल 
मेरे बाद 
पर जानता हूँ इतना 
सफेद चींटियों की तरफ 
शब्द नहीं मरते कभी 
न सपने 
न कविता

कहीं टिकने नहीं देता

कल तक जो मेरी सोच में 
दुश्मन की तरह था 
आज मेरी सोच का 
हमराज हुआ जाता है 

यह भी क्या  वक्त 
कहीं टिकने नहीं देता मुझको 
पाँव रखता हूँ कहीं 
फिसला कहीं जाता है

तुम्हे फ़ोन करते हुए

तुम्हे फ़ोन करते हुए
कहीं मैं ही तो नहीं अपना चोर

छतीस

कभी कोई 
नन्हा सा प्रश्न 
लबरेज़ मासूमियत के साथ 
पूछ बैठता है 
यह छतीस क्या होते हैं अंकल 


थर्टी सिक्स कहते हुए 
मेरे होंठ कांप जाते हैं 

कैसे कहूँ उससे 
यह तुम्हारी राष्ट्र-भाषा से हुआ  
साभिप्राय छल है 

कैसे समझाऊँ उसे 
यह सारा  खेल 
यह पढ़ाई
यह ताम-झाम 
तुम्हें 
छतीस के आँकड़े में 
धकेलने की  
तैयारी है 

और 
जब तुम 
समझ पाते हो तरेसठ 
उम्र गुजर चुकी होती है  


बेकार है

मेरी आँखों में 
जल रही है नींद 
कौंध रहे किरचों से 
कुछ सपने कोरे 

इस धुएं में 
मुझे कुछ नहीं सूझता 


कहाँ हैं 
शब्द... अर्थ ...ध्वनियाँ 
सभी तो जल रहे हैं 

यह तिड़ तिड़  की आवाज़ 
आप भी तो सुन रहे हैं 
फिर भी पूछते हैं 
क्या हुआ ?

पर 
क्या होगी
 आपकी दिलचस्पी 
कुछ शब्द बटोरेंगे 
उन्हें तलेंगे
पकाएंगे 
खायेंगे और भूल जायेंगे 

बेकार है  
 आपसे कुछ कहना 
 

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

 

कवि होना

वाह!
धडाक से कहा दिल ने 

हाँ !
इसे कहते हैं ..कवि होना !

जीवन की इस
 घनीभूत असहजता में से 
सहजता को तलाश लेना 

जटिलतम से 
सरलतम को चीन्ह लेना 

कवि होना 
प्रश्न-चिन्ह होना है 

कवि होना 
जैसे किसी सेल में 
बिजली का होना 

जैसे किसी देह में
 धडकनों का होना है 

(बलदेव वंशी को सुनकर )

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

मेरे ख्वाबों में इक शहर है ऐसा

 

लबों पे  
इश्क के तराने
दिलों  में 
मुहब्बत के अफसाने 
मेरे ख्वाबों में 
इक शहर है ऐसा 
जैसे 
कडकती ठंड में दस्तानें 

 

22 सितम्बर 2010

प्रिय दिव्या के लिए धन्यवाद के साथ

  "दिल में ऐसे उतर गया कोई 
जैसे अपने ही घर गया कोई
आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी 
मुझ से होकर गुजर गया कोई  
इतने खाए थे रात से धोखे 
चाँद निकला कि डर गया कोई"

(उपरोक्त पंक्तियाँ 
सूरजभानु गुप्त के काव्य-संकलन 
"एक हाथ की ताली" से हैं 
उनकी पुस्तक को पढ़ने के बाद 
मेरे उदगार इस प्रकार व्यक्त हुए) ---

"एक हाथ की ताली"
दी खुद को गाली
इत्ती देर से मिली 
यह कविता मतवाली 

मुझे शक है 
शहर की नीयत पर 

नहीं होती 
शहर में संवेदना 
इतनी गहरी 
कि 

हर भाव हर भंगिमा 
चुन ले 
अपने माप के शब्द 
और नाचने लगे

मुझे शक है कि  
यह कविता 
सूरजभान की हैं

नाम 
बेशक है उनका 
पर कविता गाँव की है 

... श्याम 

यह कवि था

कभी जब 
वह सुबह होगी
जिंदगी पुर-लुत्फ़ 
पुर-सकूं होगी
पलट कर एक बार 
कर लेना याद
कवि को भी

यह कवि था
जिसने भाव को ध्वनि दी
ध्वनि को शब्द दिए
शब्द को अलंकृत किया
तुम्हे भाषा दी

कल्पना करो
अपनी बात कहने के लिए
तुम्हारे पास मुहावरा ना होता
गीत न होते,  कविता न होती

तुम आज भी
कच्चे मांस के स्वाद से
आगे नहीं निकल पाते

गम

गम 
ऐसा तेज़ाब होता है 
दिल 
जिस्मों जां तक ही नहीं 
रूह तक का अज़ाब होता है 

गम के मारों के लिए 
पीना सवाब होता है

कामन वेल्थ

1.
जुबाँ की आँख नहीं 
आँख बे-जुबाँ मेरी 
कहूँ  तो किससे कहूँ 
क्या है दास्ताँ मेरी 
फलक ने खोल दिए राज़ सब 
जो पिन्हा थे 
कामन वेल्थ खेल 
और यह जाँ मेरी
 --श्याम 

2.
दांत बेचारे क्या करें 
कुछ फौजी हैं  कुछ गुन्डे हैं 
चबाते हैं 
हुकम बजा लाते हैं 

खतरनाक तो है  जुबाँ 
स्वादों की मारी 
दुखियारी 
सिर्फ हुक्म चलाती है 

दिल्ली को   
कामन वेल्थ 
बना  जाती  है


शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010

(:हँडल विद केयर:)

न उसे देखा था कभी
न सुना कभी
न कुछ लेना था उससे
न कुछ देना था उसे  

फिर भी उसकी याद
जैसे
गर्म दोजख दिनों में
बरसात की फुहार सी   
चूम गई है मुझे
अभी के अभी

यूं ही बैठे-ठाले 
सोचने लगा हूँ  
आखिर क्या हुआ था ऐसा  
हमारे बीच  
जो वह शोख कली यूं रूठ गई
पलट कर पूछा तक नहीं  
मरीजों का हाल  

जरूरी है
बहुत जरूरी है
कुछ चीज़ों कुछ रिश्तों पर
लिखा रहना
(:हँडल विद केयर:)

शायद यह देश ...


निकाल कर जंजीरों से

टांग दिया सलीब पर
अब किसी हथौड़े की चोट
किसी कील की चुभन
कोई असर नहीं करते

शायद यह देश ...

यह मेरा देश ..


मेरी आँखों में तो अब
पानी भी नहीं है ...

घुटन

मैं यूं ही 
कविता के पीछे 
क्यों पड़ा रहता हूँ 
क्या लेना-देना है 
मेरा कविता से 
न यह मेरे 
किसी बिल को 
भरने के काम आती है 
न किसी दफ्तर में कुर्सी दिलाती है 
बस 
 घोटती रहती है 
मेरी घुटन की भांग 
बारीक और बारीक 
कि
एक-एक परमाणु 
चिन्चियाने लगता है 
मुझे तो 
यह भी नहीं मालूम 
इतनी पिसी हुई
 घुटन को कहाँ फेंकू 
कैसे बचूं और बचाऊँ जग को 
इसके विकरण से 
 

अपने उड़न- तश्तरी साहब के नाम :)

एक लग्ज़री 
चार तश्तरी !

छापू किधर है !

पंखा चलाओ !

अरे !
बाहर, मेरी साइकल खड़ी है 
ख्याल रखना ! 

दरअसल

वह किसी से प्यार नहीं करता
कैसे 
कर सकता है 
किसी से प्यार 
खुद से नाराज आदमी 
वह तो बस
अपनी नाराजगी को 
भुनाने के सबब 
प्यार का ढोंग करता है 
इससे भी उससे भी 
सबसे 
इस आदमी का ऐतबार न करना 

खेल

मैं
परमाणु को देखूं

या
प्रकाशाब्धियों-पूर्व
शुद्ध ऊर्जा में हुए उस 
महा-महा-विस्फोट को देखूं

या
इन छोरों में कहीं टंगे से 
अपने इस
अस्तित्व-हीन
अस्तित्व को देखूं ..

या
अपने ही ज्ञान में बंधे
परम अज्ञान को देखूं ..

परम बोध की
अबोधता में लौट चलूँ ..
या
गति में
अगति का नियंत्रण देखूं ..

आखिर
हुआ क्या है मुझे

खुद से खुद की
छुपा-छुपाई का
यह क्या खेल
खेलता रहता हूँ ?

सत्ता

१.
वह जो बैठा 
सत्ता की ऊंची अटारी
देखता तमाशा
कैसे बेबस वानरसेना
बनाती है कागज के पुतले 
ऊंचे से ऊंचे
बुराई पर
अच्छाई की जीत का 
जश्न मनाती है
सहस्त्रग्रीवी रावण के ठहाके 
पटाखों में गूँज उठते हैं
हमें लगता है
रावण जल रहा है...
२.
रावण
नहीं जलता कभी
उसकी नाभि में है
सत्ता-अभिमंत्रित
अमृत-कुण्ड
“मैं और 
मेरा-परिवार”का
दुर्दम्य अहंकार
शोषण.. षड्यंत्र 
३.
सत्तासीन होने के बाद
खुला राम के समक्ष
सत्ता का रहस्य
पर हो चुकी थी देर
(कीमत जानकी को
चुकानी पड़ी)
आता रहा उन्हें याद
वह उन्मुक्त वन-जीवन
प्रकृति का परिवेश
सब के सब दरवेश
नित्य नयी चुनौतियां
तरो-ताज़े समाधान
और कहाँ यह 
सिंहासनी 
नैतिकता 
नियम-धर्म-पाखण्ड
सिद्धांतों, आदर्शों में लिपटे  
नकली, खोखले बंधन
तभी तो लिया 
कृष्णावतार
किया चीरहरण.. दिया वस्त्र-दान
पर सभ्यता के पाखंड को 
कौन कैसे बाँचे अनकही 
गीता-रामायण !

कंचनजंघा


परमात्मन्
जो कुछ भी लिखूं
तुझे साक्षी मान कर लिखूं
सच या झूठ.. जो भी

कहीं लिखी थी इसी कलम ने
एक पंक्ति
सच कहना कंचनजंघा लांघना है
क्या बिना प्रेम का भी होता है
कोई सच या कंचनजंघा ?

जिस किसी ने भी
दिया होगा,
पर्वतशिखर को यह नाम
कैसा गजब का अजीब सा
 आशिक होगा
अपने समय का

 मेरा भूगोल कमजोर है ..
नहीं मालूम
पृथ्वी की नाभि में खिली
प्रस्तर कमल श्रृंखला सी  
इस पर्वतमाला में
कौन है कहाँ है ..कंचनजंघा 

(पर इतना पता है
इस नाम का भी
एक पर्वत-शिखर है) .
(यह गूगल सर्च देवता किस दिन काम आएगा)
तो यह रहा  
कंचनजंघा शिखर
विश्व में तीसरी सबसे ऊँची ..
सोने की जांघ

वाह रे शिव!
अपनी पारो की ऐसी तारीफ़ तो
किसी देवदास ने भी नहीं की
पर मैं यह सब
क्या लिख रहा हूँ  

ओह!
यह तो जैसे हर दिन
लिख जाता हैं रश्मि-रथी 
 झिलमिलाते हिम-रजत-पत्र पर  
अपना स्वर्णिम प्रेम-पुराण 
सांझ लौटते
नहीं भूलता बटोरना
संदेस प्रियतमा पृथ्वी का 
पर, मैं यह सब
क्यों लिख रहा हूँ?

पर्वत
दूर से ही
भले नजर आते हैं
या फिर होते हैं
शिव-तुल्य
दुस्साहसियों के लिए

मुझसा
कमजोर दिल दिमाग आदमी
क्या करे पर्वतों की बात
क्या गाये पृथ्वी-सूर्य
के प्रेम गीत
(इस असामाजिक सामाजिकता से
फुर्सत मिले..
तब ना !)

भई तू तो
दूर से ही कर ले नमस्कार
यह काम तो किसी भवभूति
किसी कालिदास के लिए छोड़ दे

विरसे में




विरसे में बस एक किताब
दशकों फैली 
मृगतृष्णा सी एक किताब 

बच पाएगा 
कब तक इसका सच 
जिल्दे पर तो
पंजा मारे बैठे है 
केतु के धड 
राहू के सिर
"सत्यमेव जयते पर"

विरसे में बस यही  किताब
दशकों फैली 
मरू-भूमि सी... यही किताब

बचपन



छुटपन में पतंगें उड़ाने का गजब शौक था
आज बूढों बूढों को कम्पनियां उड़ाते देखता हूँ
और मुझे बचपन याद आ जाता है

इबादत




निगाहें  चुराने में क्या रक्खा   है
नजरें मिलाना कुछ और बात है
बातें बनाना सभी को आता है 
करके दिखाना कुछ और बात है 

कुफ्र हर हाल में 
जनूं-ए-जिहाद-ओ-नादानियां 
नगमा-ए-नूर-ओ-जीस्त सुन पाना 
कुछ और बात है 

नमाज-ओ-दुआ भी 
बे-मकसद नहीं श्याम 
इबादत का उतर आना कुछ और बात है