कभी जब
वह सुबह होगी
जिंदगी पुर-लुत्फ़
पुर-सकूं होगी
पुर-सकूं होगी
पलट कर एक बार
कर लेना याद
कवि को भी
यह कवि था
जिसने भाव को ध्वनि दी
ध्वनि को शब्द दिए
शब्द को अलंकृत किया
तुम्हे भाषा दी
कल्पना करो
अपनी बात कहने के लिए
तुम्हारे पास मुहावरा ना होता
गीत न होते, कविता न होती
तुम आज भी
कच्चे मांस के स्वाद से
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