मैं समुद्र ही हो सकता था
सोमवार, 2 दिसंबर 2013
तुम्हे फ़ोन करते हुए
तुम्हे फ़ोन करते हुए
एक झिझक सी महसूस होती है
कुछ वैसी जैसे मन में कोई चोर हो
खूब देखा भाला झाडा पोंछा
मन के एक एक कमरे को
एक एक खिड़की दरवाजे को
पर दिखा नहीं
शायद कभी आया हो ठहरा हो
और कुछ न पाकर चला गया हो
मैं लिखना चाहता हूँ इस चोर पर
अपनी सबसे प्यारी कविता
पर उसका कोई स्पर्श रूप रस गंध
कुछ भी तो नहीं मेरे पास
कहीं मैं ही तो नहीं अपना चोर
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