सोमवार, 2 दिसंबर 2013

लौटते हुए

अब जब 
आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द की  
शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ 
वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण 
करती चली गई

ताकि लौट कर 
कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
और 
जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए

ताकि 
प्यार, प्यार हो
न कि बंधन

ईश्वर 
ईश्वर हो
न कि जड़ों तक 
उतरा हुआ डर

स्वतंत्रता 
स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और
 कानून के मछुआरे जाल


ताकि 
जीवन, जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल

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