मैं यूं ही
कविता के पीछे
क्यों पड़ा रहता हूँ
क्या लेना-देना है
मेरा कविता से
न यह मेरे
किसी बिल को
भरने के काम आती है
न किसी दफ्तर में कुर्सी दिलाती है
बस
घोटती रहती है
मेरी घुटन की भांग
बारीक और बारीक
कि
एक-एक परमाणु
चिन्चियाने लगता है
मुझे तो
यह भी नहीं मालूम
इतनी पिसी हुई
घुटन को कहाँ फेंकू
कैसे बचूं और बचाऊँ जग को
इसके विकरण से
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