सोमवार, 2 दिसंबर 2013

घुटन

मैं यूं ही 
कविता के पीछे 
क्यों पड़ा रहता हूँ 
क्या लेना-देना है 
मेरा कविता से 
न यह मेरे 
किसी बिल को 
भरने के काम आती है 
न किसी दफ्तर में कुर्सी दिलाती है 
बस 
 घोटती रहती है 
मेरी घुटन की भांग 
बारीक और बारीक 
कि
एक-एक परमाणु 
चिन्चियाने लगता है 
मुझे तो 
यह भी नहीं मालूम 
इतनी पिसी हुई
 घुटन को कहाँ फेंकू 
कैसे बचूं और बचाऊँ जग को 
इसके विकरण से 
 

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