"दिल में ऐसे उतर गया कोई
जैसे अपने ही घर गया कोई
आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी
मुझ से होकर गुजर गया कोई
इतने खाए थे रात से धोखे
चाँद निकला कि डर गया कोई"
(उपरोक्त पंक्तियाँ
सूरजभानु गुप्त के काव्य-संकलन
"एक हाथ की ताली" से हैं
उनकी पुस्तक को पढ़ने के बाद
मेरे उदगार इस प्रकार व्यक्त हुए) ---
"एक हाथ की ताली"
दी खुद को गाली
इत्ती देर से मिली
यह कविता मतवाली
मुझे शक है
शहर की नीयत पर
नहीं होती
शहर में संवेदना
इतनी गहरी
कि
हर भाव हर भंगिमा
चुन ले
अपने माप के शब्द
और नाचने लगे
मुझे शक है कि
यह कविता
सूरजभान की हैं
नाम
बेशक है उनका
पर कविता गाँव की है
... श्याम
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