सोमवार, 2 दिसंबर 2013

कंचनजंघा


परमात्मन्
जो कुछ भी लिखूं
तुझे साक्षी मान कर लिखूं
सच या झूठ.. जो भी

कहीं लिखी थी इसी कलम ने
एक पंक्ति
सच कहना कंचनजंघा लांघना है
क्या बिना प्रेम का भी होता है
कोई सच या कंचनजंघा ?

जिस किसी ने भी
दिया होगा,
पर्वतशिखर को यह नाम
कैसा गजब का अजीब सा
 आशिक होगा
अपने समय का

 मेरा भूगोल कमजोर है ..
नहीं मालूम
पृथ्वी की नाभि में खिली
प्रस्तर कमल श्रृंखला सी  
इस पर्वतमाला में
कौन है कहाँ है ..कंचनजंघा 

(पर इतना पता है
इस नाम का भी
एक पर्वत-शिखर है) .
(यह गूगल सर्च देवता किस दिन काम आएगा)
तो यह रहा  
कंचनजंघा शिखर
विश्व में तीसरी सबसे ऊँची ..
सोने की जांघ

वाह रे शिव!
अपनी पारो की ऐसी तारीफ़ तो
किसी देवदास ने भी नहीं की
पर मैं यह सब
क्या लिख रहा हूँ  

ओह!
यह तो जैसे हर दिन
लिख जाता हैं रश्मि-रथी 
 झिलमिलाते हिम-रजत-पत्र पर  
अपना स्वर्णिम प्रेम-पुराण 
सांझ लौटते
नहीं भूलता बटोरना
संदेस प्रियतमा पृथ्वी का 
पर, मैं यह सब
क्यों लिख रहा हूँ?

पर्वत
दूर से ही
भले नजर आते हैं
या फिर होते हैं
शिव-तुल्य
दुस्साहसियों के लिए

मुझसा
कमजोर दिल दिमाग आदमी
क्या करे पर्वतों की बात
क्या गाये पृथ्वी-सूर्य
के प्रेम गीत
(इस असामाजिक सामाजिकता से
फुर्सत मिले..
तब ना !)

भई तू तो
दूर से ही कर ले नमस्कार
यह काम तो किसी भवभूति
किसी कालिदास के लिए छोड़ दे

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