मैं समुद्र ही हो सकता था
सोमवार, 2 दिसंबर 2013
कहीं टिकने नहीं देता
कल तक जो मेरी सोच में
दुश्मन की तरह था
आज मेरी सोच का
हमराज हुआ जाता है
यह भी क्या वक्त
कहीं टिकने नहीं देता मुझको
पाँव रखता हूँ कहीं
फिसला कहीं जाता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें