गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

फासले

मछली जल में जन्म लेती है
जल से बाहर मर जाती है
आदमी झूठ में जन्म लेता है
झूठ से बाहर मर जाता है

पर कविता
सच में जन्मती है
सच के लिए धडकती है

शायद इसीलिए
आदमी और कविता  में
फासले.. और फासले..
और और फासले बचे रहते हैं !

उमस

बुधवार, अक्तूबर 21, 2009

(रचनाकार महाराज कृष्ण सन्तोषी)

महाशय
आप पूछ सकते हैं
जब उमस हो
तो तैमूर को
याद करने में क्या तुक


पहाड़ बर्फ नदियाँ
स्मृतियों में इनका आना
स्वाभाविक है
पर उमस में जाग जाना
इतिहास बोध
सचमुच हैरान कर देने वाला है


महाशय आप और कुछ न पूछें
सिर्फ़ सुनें

दरअसल
हमारे यहाँ जब बच्चों को
daant पड़ती थी
तो बुजुर्ग उनसे यह कहते थे
जा तुझे देखने पड़ें
उमस भरे दिन

इस daant में
हमारे इतिहास का वह दस्तावेज़ है
जो हमारी ही सांसों में
खुलता बंद होता है


महाशय
आप विश्वास करें न करें
पर जब उमस badti है
समय बैचैनी से कटने लगता है
हमें अपना इतिहास याद आता है

सात सौ साल पहले
तैमूर के डर से
भाग आए थे
हमारी धरती पर सात सौ घुड़सवार
और उन डरे हुए
सात सौ घुड़सवारों के डर से
सात लाख इंसानी शक्लें
कब से भटकती फ़िर रही हैं
यहाँ वहां
पसीने स लथपथ


महाशय
आप जिसे उमस कहते हैं
हमारे लिए उसका सम्बन्ध
समंदर से नहीं
तैमूर के आतंक से है ... 

मैं समुद्र ही हो सकता था

बृहस्पतिवार, अक्तूबर 22, 2009


मैं समुद्र ही हो सकता था
कि प्रत्येक धारा ने
मुझ ही में समाना है
मुझ ही से पाना है
अपने प्रवाह का बल

अपार है मेरी कड़वाहटों का विस्तार
पर अथाह है मेरी प्रतिबद्दता

आओ तमतमाई हुई झुलसी हवाओं
मुझ से लो जितनी चाहो उतनी नमी

शिखरों को विशुद्द सत्व से
धवल करो
तराई मैदानों में भरो इन्द्रधनुषी रंग

अरे मेरी चिंता न करो
मेरा गौरव मेरी व्यथाओं में सुरक्षित है.

वक्त

रविवार, दिसम्बर 27, 2009


वक्त
जेब कतरा वक्त
न जाने 
कब से लगा था पीछे
और अचानक . .
 सब खो गया

किस थाने .. 
करूं शिकायत 
अपनी ही बेख्याली का
आता है रोना

क्यों चला आया
चेहरों पर चढ़े चेहरे
इस शहर को देखने
रखा ही क्या था यहाँ

हर आस नकली
 हर सपना झूठा

वक्त जेबकतरा 
हाकिम इस शहर का..

बर्फ


बर्फ  जो  हर  साल
किसी दोस्त  सी उतरती थी
कहवों और कह्कहों  के बीच
इक शाने बे नियाजी के साथ
सेबों को बाँटती लालिमा
धान को जीवन के गीत
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी

जैसे आडिट की कोई
मुहीम चली थी आसमानों  में

जैसे पूछ रही थी
मेरी इस घाटी को रक्तरंजित करने का
मेरे ही बन्दों को बेघर
दरबदर करने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया था

बर्फ जो गिरी थी इस बार
जैसे पहाड़ों के पास अपने
दाग धोने के लिए भी  बचा नहीं  था पानी

बर्फ जो हर बार
किसी दोस्त सी उतरती थी
इक शाने बे नियाजी के साथ
इस बार गिरी थी किसी लेनदार  सी

सन्दर्भ :- कश्मीर से विस्थापन के बाद किसी एक साल बर्फ ने अपना तांडव दिखाया  था  कश्मीर में

एक छोटे से कवि की छोटी छोटी बातें

सोमवार, दिसम्बर 28, 2009


एक
हर  कोई
स्वयं  को  खास  ही समझता है
फिर वह  आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं

दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के

तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों  के   हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना

चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से  अ  निकल कर
सत्य से जुड़ गया है

पांच 
दुनिया  का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण  

छ 
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए

जिनका कोई शीर्षक नहीं होता

मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009


जिनका  कोई  शीर्षक  नहीं  होता
मैं  ऐसी   ही  भटकी  हुई  कविताओं  का  कवि  हूँ

मेरी  कविताओं  की  वेश  भूषा
जिक्र  मत  करो  
उनके  बालों  को
कंघी  भी  नसीब  नहीं  होती
वह  तो  बस  तडके  उठती  हैं
कुछ  बचा  खुचा  मिला  खा  लेती  हैं
अक्सर  भूखी  ही
निकल  पड़ती  हैं  काम  पर

काम  उनका  क्या
खाली  बोरों  में  इधर  उधर  की  खबरें
कुछ  फेंके  गये  प्लास्टिक  शब्द

उनके  हाथ  में  एक  छड  भी  होती  है
जिसके  सिरे  पर
मिकनातीस  का  टुकड़ा   लगा  रहता  है
रास्ते  के  कील  कांटे
साफ  करती  हैं  मेरी  कविताएँ

मेरी  कविताएँ  स्कूल  नहीं  जातीं
बक्सा  वैनों   में  बैठ  कर
उन्हें  फुर्सत  ही  नहीं  मिलती
इतना काम  है  उनके  पास

सिर   पर  उठाये आसमान
व्यर्थ  से  अर्थ   छानती   हैं  मेरी   कविताएँ..

सिलवटें

बुधवार, दिसम्बर 30, 2009


सिलवटें
यों मेरे पैराहन में न देख
मैं समुद्र सा
बड़ी दूर तक फैला हूँ दोस्त!

पथ भुजंग

रविवार, जनवरी 03, 2010


पथ भुजंग
पाथेय विष
कैसे आऊँ तुम तक
अमा निशा गिरि  उतंग
पथ भुजंग!

इससे पहले कि


इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में

इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें

इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे

उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद

साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल

कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो  लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व

इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं

ईश्वर

बृहस्पतिवार, जनवरी 07, 2010


जिन्होनें कहा
ईश्वर प्रकाश  है
उन्होनें यह न कहा
कितने गहन अंधेरों से भिड कर
उपजा यह प्रकाश

उन्होनें यह न कहा
न होने के विरोध में
होने की यात्रा है ईश्वर

उन्होनें यह भी  न कहा
ईश्वर अथक  प्रयोगधर्मिता  है
और हर ठहराव
ईश्वर के खिलाफ जाता है

मैं एक साथ


मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ

यह जो

सोमवार, जनवरी 11, 2010


यह जो
डरा डरा खोया सा
कुछ न कुछ
पाने की चाह में मारा मारा
अदृश्य रस्सियों में बंधा
सोचता ही रहता
कुछ न कुछ
हर समय

यह जो
कदम भर भी
चल नहीं पाता
और नाप आता है
ब्रह्मांडीय  दूरियां  
देख नहीं पाता कुछ भी
सजाता रहता
ध्वनियों  की
चित्रों की
शब्दों  की दुनिया

यह जो .. .. ..

प्यार और नफरत

रविवार, जनवरी 17, 2010


प्यार के बदले प्यार
सब करते हैं

नफरत के बदले नफरत
सब करते हैं

प्यार के बदले नफरत
कोई विरला ही करता है
जैसे तू

नफरत के बदले प्यार
विरलों में कोई विरला
जैसे मैं

गीत


मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

भले ही उम्र अब मेरी जवां नहीं
भले ही दिल में वलवले तूफां नहीं
हैं आरजू के खंडहर हर तरफ
भले ही सर पे छत नहीं मकां नहीं
नहीं हैं पस्त हौसले मेरे अभी
भले ही मेरे मुह में जुबां नहीं

मैं ईंट ईंट बीन कर वक्त की
नई सदी को सच की राह मोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं पर्वतों को लाँघ छोड़ आया हूँ
मैं दलदलों को नापतोल आया हूँ
हूँ रास्तों की मुश्किलों से बाखबर
मैं रास्तों को मंजिलों से जोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा

मार्तंड कुण्ड

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009


तुझे याद करते हुए
लिखना चाहता हूँ एक अर्थमुक्त कविता
सिर धुनते रहें शब्द पकड़ने वाले
अर्थ उनके हाथ से फिसल फिसल जाएं
मार्तंड कुण्ड की मछलियों की तरह
मैने तो समुद्र खंगाले हैं
मुश्किलन बचा हूँ
शार्कों व्हेलों का निवाला बनने से
फिर मुझे यह मार्तंड कुण्ड
क्यों याद आते हो मार्तंड ! विस्थापन में
तेरा प्रतिनिधि मेरा मित्र कवि
है तो सही मेरे संग यहाँ मेरे पास
तेरे जल में किलोलती मछलियों सी उसकी कवितायें
कहीं भी रहूँ समुद्रों में
पर्वतों पर
आसमानों में
तेरे कुण्ड की मछलियाँ और
उसकी कवितायें मुझे खींच लाती हैं जमीन पर
आज तो बस जी चाहता है
जो जी में आये लिखता चलूँ
कोई पराकाष्ठा छू लूं
यह भी क्या
हर बार लिखते रहें हम
सोची समझी साजिशों सी कवितायेँ!

नदी

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009


नदी मैं जानता हूँ
बूँद बूँद पहाड़ सा दर्द
जब रिसता है
तुम लेती हो जन्म

जानता हूँ
पत्थरों की पछाड़ से
चट्टानों की कोख से
उगाहते हुए
पहाड़ की मिटटी का कुअरापन
कैसे निकलती फलांगती
अल्हड सी गुजरती हो
धरती के घावों पर रखती मरहम

लेकिन नदी
कैसा लगता है
किसी खूंखार मोड़ पर
सभ्यता की कत्लगाहों से
और कत्लगाहों की सभ्यता से
निकले रक्त का
तुझमें आ मिलना !

कैसी लगती है
अपने भीतर मचलती
मछलियों की अपमृत्यु

कैसा लगता है
धरती का पाप गरल धोना
और समुद्र भर रोना

सच कहना नदी ॥ .

हे गणेश जी सबसे पहले आप ही की पूजा क्यों ?

शुक्रवार, 3 सितम्बर 2010


हाँ  बच्चा! सबसे पहले मेरी ही पूजा होनी चाहिए.. क्योंकि, मैं गणित का देवता हूँ  .. गणित का मायना समझते हो बच्चा! ..योजना बनाना  ! किसी भी काम को करने से पहले योजना बना लेना ही मेरी पूजा है, फिर उस काम में सफल होने के अधिक अवसर होते हैं ... देखो मेरा आकार प्रकार हाथी जैसा, लेकिन, वाहन चूहे ! जानते हो क्यों ?
क्योंकि योजना का आकार प्रकार तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन, उसे पूरा करने का काम तो छोटे छोटे लोग ही करते हैं ना! इसीलिए मुझे ॠद्धि सिद्धि का देवता कहा गया है.. और कार्य योजना भी जब बनाओ तो मुदित-मन से बनाना ..यही मेरा मोदक-प्रिय होने का रहस्य है
 .. अच्छा तो इस ब्लॉग के लिए तुमने कोई योजना बनाई है ?
.. अभी तो नहीं देव ..
.. तो चलो सबसे पहले यही काम करो ...कब, क्यों, कैसे, कहाँ.. सारे "क" वाले प्रश्न ले आओ  ..जहां मुश्किल आये तो मुझसे पूछना ..भला !
जैसी आज्ञा  देव...

सृजन (एक अनूदित रचना)

सोमवार, 6 सितम्बर 2010


डॉ के.एल .चौधरी की पुस्तक Enchanting world of infants से एक रचना creation  का हिंदी अनुवाद -- अनुवादक श्यामजुनेजा  



SRIJAN
और 
तब आधी रात
टूटा बांध
छूटा और बह निकला
.प्रसव पूर्व का वह प्रथम संकेत

जैसे रिक्त किया जाना
सतीसर का जल
उस महान  ऋषि के द्वारा
घाटी को जन्म देने से पहले

कैसी थी यह
कुलबुलाती अकुलाहट तुम्हारी
अपने ही बूते चले आने की
मेरे पवित्र गर्भ की
नौ मासी कारा से बाहर

एक अभिनव यात्रा का प्रारंभ
कि कवच ही छेद डाला
अपने लघु कोमल
पादांगुष्ठ नख से
भेद डाले
सुरक्षा के जल घेरे
जो रचे थे मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे आसपास. ..

या की था यह
मेरे गर्भ का अश्रुसिक्त भाव
कि अब
अलग होने का समय आ गया है
जैसा की होता है सबके साथ

कोमल थे
प्रथम पीडा के स्पंदन
मधुर विश्रांत अंतरालों के साथ
और फिर
शक्तिमान तरंगों का नृत्य
वर्चस्व की होड़
जैसे अशांत समुद्र में लहरें

हर लहर
पहली से उतप्त उदग्र प्रचंड
किनारे से टकराने को व्याकुल

दर्द बडा और
तुम्हे धकेलते हुए बढ़ता गया
यह मेरे भीतर
तुम्हारी यात्रा के
अंतिम पडाव में एक प्रयास था
तुम्हारी सहायता के लिए
ताकि मैं तुम्हें बाँहों में भर सकूं

क्या हम दोनों ही थे
इतने उतावले  अधीर
होने को एक दुसरे के सन्मुख
अपनी अपनी देह रचना के साथ
कि सिर के बल
तुम्हारी इस यात्रा में
पहले माथा दिखा.. न की शिरोप्रिष्ठ
और गर्भ द्वार पर अटक गया 

आह
सृजन सरल नहीं होता
न ही
नकुछ से छलकता है कोई आनंद
इच्छाएं
तप के बिना सफल नहीं होतीं
समुद्र मंथन में ही तो फलता है
अमृत  और विष

यह अग्नि परीक्षा का पल
आन पंहुचा था एक साथ
हम दोनों के लिए
मुझे ले जाया गया था प्रसूतिकक्ष में
ताकि शल्य द्वारा
तुम लाये जा सको बाहर
और इस प्रकार
तुम्हारा जन्म हुआ
जैसे किसी महाविस्फोट के बाद
जन्म लेती है सृष्टि

वह रक्त और स्वेद
और आंसू और पीडा के प्रवाह में
प्रकटा ज्योतिपुंज
जैसे किसी अनादिता को पार कर
मैंने सुनी तुम्हारी चीख
जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी
न जाने कब से
और मैंने मींच ली आँखें
एक परमानन्द में

अब मुझे
टाँके लगाये जा रहे  थे 
प्रस्तुति श्याम जुनेजा 

मुझ सा उदास कोई हो दुनिया में


मुझ सा उदास
कोई हो दुनिया में
उस तक पहुंचे मेरी बात
आज कल परसों तरसों 
जैसे भी ..जब भी ..

हालाँकि 
उदासी और प्रतीक्षा में
अजीब सा गहरा रिश्ता है
पर वह मुझसे संपर्क जरूर करे

चिट्ठी से फ़ोन से ईमेल से जैसे भी..

और कुछ न हो तो
सिर्फ दिल से ही याद कर ले
कि दुनिया में कोई और भी है
उसके जितना ही उदास


कि उदास लोगों की भी अब 
होनी चाहिए एक युनियन


कि उदास लोगों को 
झूठी हंसी के मुखोटे
उतार देने चाहिए अब...

उदासी को लगने देनी चाहिए
थोड़ी सी हवा.. थोड़ी धूप !



हिंदी दिवस

मंगलवार, 7 सितम्बर 2010


पूछा कमाल पाशा नें
लगेगा कितना समय
जो बनाना हो तुर्की को राष्ट्र-भाषा
"दस बरस कम से कम"
कहा विशेषज्ञों ने
"तो समझ लो !
बीत चुके यह दस बरस -
तुर्की इस देश की राष्ट्र-भाषा है
ठीक इसी पल से ..."


पर अफ़सोस ! ओ हिंदी !
बीते इतने बरस
न मिला तुम्हें कोई कमाल पाशा ..!


शायद हम दौड़ते रहे सिर के बल
पैरों से सोचते रहे
और बनी रही तू
चिर-उपेक्षित परित्यक्ता सी
अपने ही देश में


ओ हिंदी ! मेरी मातृ-भाषा
आखिर क्या है खोट तुझमें
कि हम मनाते हैं हिंदी दिवस
जैसे पितृ-पक्ष में कोई श्राद्ध !!    श्याम जुनेजा

वह एक पल

मंगलवार, 28 सितम्बर 2010



वह एक पल
जब उस कलाकार ने तुम्हें 
कैमरे में उतारा होगा 
कितना कुछ तय कर गया 
मेरी मंजिलों-मुकाम का रुतबा 
तुमसे मेरा रिश्ता 
मेरी महबूब 

अखबार में छपी 
तेरी तस्वीर 
मैं तो देखूँगा तेरी तस्वीर 
और शब्दों को 
करने दूंगा अपना काम 
जिन्हें मैंने 
जन्मों से पाल रखा है 
मधु-मक्खियों और 
तितलियों की तरह 

कितनी मूंगफलियों का 
लिफाफा बनी होगी 
तेरी तस्वीर 
यह जो 
मेरे हिस्से में चली आयी है 
बनाएगी कितने लिफाफे 
मेरे दिल के 

ओ मरीचिका !

तुम्हें पुकारते हुए

बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010



तुम्हें पुकारते हुए 
जिनसे होती है मुलाक़ात 
वे मेरे दिल की तहों में छिपे राज़ हैं!

 या
 भीगने को बेताब मौसम में 
अबाबीलों के बच्चों की उड़ान! 

या
 दूर  किसी पहाड़ में बसे 
गाँव के लोगों के भोले डर 
जो शहरी उजालों से डरतें हैं !

तुम्हें करते हुए याद

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010


तुम्हें करते हुए याद 
मुझे लगता है डर
तेरी नींद में जाकर 
मेरी याद 
कोई बवाल न कर दे 

तुम कहीं भटक न जाओ 
किसी सपने के बेतरतीब 
डरावने 
और खूबसूरत जंगल में 

हमारे  बीच की यह दूरी 
किसी और यात्रा का 
रुख न कर ले 

डरता हूँ 
तुम्हें करते हुए याद

इश्क

मंगलवार, 2 नवम्बर 2010


मजाजी हो हकीकी हो 
इश्क तो इश्क है 
वे जो चिढते हैं इश्क से 
अगर देख पाते 
यह करिश्मा ..यह कायनात ..
यह सारे का सारा वजूद 
है किसी के इश्क का नजारा 
पर 
उन्होंने तो बाँध रक्खी हैं
आँखों पर पट्टियाँ  
हवा में भांजते फिरते हैं लाठियां 
शायद 
ये उनका शौक हो या पेशा 
हुआ करे 
मुझे क्या एतराज 
वे खंदके खोदें 
खाईयों को और चौड़ा करें 
झूठ और नफरत की आग में 
सडें लडें मरें 

मैं उन्हें रोकूँगा नहीं 
बस 
तौहीने इश्क न करें 
इस कुफ्र की 
कहीं कोई तौबा नहीं 

श्याम जुनेजा

किताबें

शनिवार, 25 सितम्बर 2010


कोई भी किताब आपको कुछ नहीं देती.. आप जो लेना चाहते हैं ले लेते हैं ... आप क्या लेना चाहते हैं; इस पर निर्भर करता है कि आपको क्या सिखाया गया है .. जब आप  इस सीखे हुए से मुक्त होकर, निष्पक्ष होकर, किताब से कुछ ले पाते हैं.. उतना ही आपका अपना होता है.. इसी के आधार पर आप में किताब-ऐ -जीस्त को पढ़ने की कुव्वत पैदा हो पाती है ... यह समझ लिया जाना चाहिए.. जिंदगी से बड़ी न कोई किताब थी, न है, न होगी ..जिसने जिंदगी की किताब नही पढ़ी, उसमे इबादत  की पात्रता भी विकसित नहीं हो पाती और यदि आपकी जिंदगी में  इबादत नहीं है तो वह मिटटी है..
अगर एक किताब अल्लाह के फरमान से है तो दुनिया की सारी किताबें भी अल्लाह के फरमान से हैं क्योंकि वह एक है और उसी के फरमान से सब होता है ..ये किताबें आपकी मदद के लिए हैं आप पर लादे  जाने   के लिए नहीं हैं 

अदा !

रविवार, 26 सितम्बर 2010


अदा ! हाँ.. यही पेज तो लेना है आज !  आज तो मुझे अपनी इसी दिलरुबा से बात करनी है !..वैसे, जब अखबार से यह तस्वीर उतारी थी, तब यह नहीं सोचा था की इस पर भी कभी कुछ  लिखूंगा ! बस खटक गया था कुछ भीतर.. शायद ! यह मेरी कविता है..!
बायीं हथेली पर धरी ठुड्डी .. मुड़ी हुई उंगलियाँ, बायीं गाल में धंसी हुई ! गिरती हुई बालों की लट, जैसे कश्मीर के रस्ते में नासरी-नाले के पास एक पतली सी जल-धारा.. एक ऊँचाई से गिरती हुई !
प्रसिद्ध फ़िल्मी हस्तियों के चेहरे, मेरे इसी काम तो आते हैं   मेरी इस अनाम गुड़िया-बेबी का चेहरा, जवानी में, फिल्म-अभिनेत्री राखी के मुहांदरे के आस-पास ठहरता है ..
चेहरों में मेरी दिलचस्पी ! आम सी बात है.. हम सब चेहरों में ही तो जीते हैं..जितने चेहरे बाहरी दुनिया में दिखते हैं; उसके दस गुणा तो हमारे भीतर टहलते रहते हैं ! इस चेहरे का तो मुझे नाम भी नहीं मालूम .. पर खास बात .. यह अदा ! कुशल से कुशल निर्देशक और मंझे हुए कलाकार के भी पसीने छूट जायें इसे पकड़ने में ! मुझे तो जैसे बिन मांगे मोती मिल गया ! यह मेरी कविता !
अदा ! इससे पहले कि असली मुददे पर आया जाये, वो वारदात तो बतानी होगी, जिसने तेरी इस अदा को कैमरा दिया..खास कुछ नहीं, इंडिया मैच हार गया था उस दिन ! वही किरकट ! क्या होती है किरकट.. क्या होता है मैच ! मेरी जाने बला ! कौन जीतता है, कौन हारता है.. अपनी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता ! 
पर मुझे यह मैच रास आ गया..टकसाली चेहरों की भीड़ में यह अदा कहाँ से मिलती अगर इंडिया मैच न हारता !
हाय ! क्या संजीदा चेहरा और आँखों में लरजते हुए तूफ़ान ! नाक  की नोक पर सजा हुआ गुस्सा ! कसे होंट! पता नहीं कितनी-कितनी खट्टी मीठी गालियां चबाते हुए ! जैसे पता नही क्या हो गया है ! नहीं अदा तेरी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा रहा .. न ही कोई मजाक उड़ा रहा हूँ ..मैं तो सिर्फ उन खूबसूरत पलों को शब्द देने की कोशिश में हूँ जिसे उस कैमरा  कलाकार ने कैद किया है ! पर मुझे कुछ और भी कहना है.. हमारी यह राष्ट्र-भक्ति, हमारा यह भारत-प्रेम, यह जनू-ए-इंडिया ! क्रिकेट- प्रेम की झालर बन कर क्यों रह गया है ? इतनी संकुचित क्यों है हमारी दृष्टि, कि मात्र क्रिकेट मैच के हारने का यों मातम मनाया जाये ..?  क्या खेल को, खेल की भावना से नहीं लिया जाना चाहिए! बेशक, हम हारे, तभी तो दूसरा जीता! ..क्या हम अपनी हार को एक तरफ रख कर, दूसरे की जीत में शरीक नहीं हो सकते ? ..और जिसकी जीत में हम शरीक नहीं हो सकते उसके साथ हमें खेलना ही क्यों चाहिए ?

अद्वितीय

बुधवार, 26 जनवरी 2011


अद्वैत क्या है ? दो विपरीत अतियों का संगम .. जितना ताप, उतनी शीत; जितना प्रकाश, उतना ही अन्धकार; जब एक दूसरे में समा जाएँ तो परिणाम क्या है ? इसे आप कविता की भाषा में पूर्ण कह सकते हैं.. गणित की भाषा में शून्य! हाकिंस, एक तरफ व्यक्त ब्रह्म की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ  ईश्वर के अस्तित्व से इनकार कर रहे हैं, यद्यपि, उनका होना या मेरा या  आपका होना, ईश्वर  के होने का अकाट्य प्रमाण है..   वे  विज्ञान के नियमों को सर्वोपरी कह रहे हैं .. वे शुरुआत भौतिकी से नहीं मान रहे .. भौतिकी के नियमों से मान रहे हैं... उनकी भाषा में " ईश्वर यदि है तो विज्ञान के नियम हैं THE LAW ITSELF".. हमारे यहाँ भी तो ज्ञान को स्वयम्भू कहा गया है.. परमात्मा को ज्ञानस्वरूप ही कहा गया है ..हमारे यहाँ जिसे अव्यक्त ब्रह्म कहा गया है उसे वे black energy नाम दे रहे हैं ..इस BLACK ENERGY के बारे में कुछ कह भी नहीं पा रहे...लेकिन, जितना कुछ कह रहे हैं वह उन्हीं निष्कर्षो तक आ रहा है जिन्हें इस देश की मनीषा छू चुकी है..

उदास दिन की डायरी

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी

(पिछली सदी के अंतिम दशक में लिखे गए कुछ पन्ने)
फिर वजह-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबा किया हुए... ग़ालिब
इसे सनक कहूँ या मनोरोग, लिखने का शौक जनून की हदों को छूने लगा है . शांत साहब ने कहा भी था,'क्यों बर्बाद होना चाहते हो?' ..पता नहीं भीतर क्या हलचल है, लिखता हूँ फाड़ देता हूँ .
अग्निशेखर ने कहा था, 'लेखक बुनकर होता है, सम्पादक दर्जी, दोनों को एक साथ नहीं रहना चाहिए.' अपने भीतर तो दोनों एक साथ डटे हुए हैं . बेचारा कबीर, दिन भर में कुछ पंक्तियाँ बुनता है और मास्टर जी कैंची लेकर आ जाते है. मास्टर जी कुछ दिन जरा घूम फिर आइये...
मीना कुमारी की पंक्तियाँ याद आ रही है
जागी हुई आँखों में कांच से चुभते हुए ख़्वाब
रात ऐसे ही दीवानों की बसर हुआ करती है
दूर कुत्तों के भौंकने में गीदड़ों की हुआ हुआ में 'राग दूरदर्शन' रात के इस सन्नाटे में रंग भर रहे हैं
ए झूम जागना रात दा बहुत मंदा
या कोई जागदा  ए पहरे दार राती
या फिर जागदा ए दुखिया मरीज कोई
या फिर जागदा ए चोर चकार राती
या फिर जागदा ए इश्क दी रमज वाला
या फिर जागदा ए परवरदिगार राती
श्याम इनमें से तुम कौन जो इतनी रात गए  जाग रहे हो?        


बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -२

दुनिया होली खेल रही है ..मैं घर में उदास दुबका बैठा हूँ ..भीतर शायद कोई मकड़ी है जाले बुनती हुई . कितना काटूं; कितना साफ़ करूं ? मुझे मेरी आदतों ने मारा है . आस्थाएं भंग, विशवास गायब ! कारण खोजता हूँ तो बात पीढ़ियों तक जा पहुँचती है.
माँ याद आ रही है . चौथाई सदी पहले इसी दिन दुनिया से विदा हुई थी. अपने अक्खडपन में कितना दुखी किया था उसे . शायद उसी का फल है . सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं . शायद पूरा जीवन यूं ही चलेगा .
"शापित सा इस जीवन का मैं ले कंकाल भटकता हूँ
इसी खोखलेपन में जाने क्या खोजता अटकता हूँ .."---जयशंकर प्रसाद

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -३

सिर भारी है. नींद का हमला. फिर भी लिखना है ... क्या लिखूं ? मन के आकाश में कितने ही सपने पतंगों से उड़ते रहते हैं. आज शायद सब के सब हड़ताल पर हैं. मनुहार करके शेखर से "इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी" लाया हूँ. केवल कविताएँ पढ़ने के लिए. कुछेक पढीं, पर ऊब गया हूँ. मन एकाग्रता के मूड में नहीं. बच्चे वैष्णो देवी गए हैं. सिर सिरहाने की खोज में ...कलम कह रही है ...छोडो कल देखना . . . .  .
कल की ऊंघ में जो लिखा, देख रहा हूँ . ख़ारिज होने के लायक भी नहीं. जो लिखा गया ठीक ही है. कम से कम अभ्यास तो नहीं छूटा.
सोचता हूँ कुछ लोगों के लिए लिखना सांस लेने जितना सहज क्यों होता है ? मुझ जैसों के लिए, यह इतने अभ्यास का विषय क्यों है? तिस पर भी वह बात तो बनती ही नहीं ! सारे तीर नीमकश ही निकल जाते है ! जहां अभ्यास छूटा लिखना भूल गए ! लिखने के लिए भीतर एक छटपटाहट चाहिए ! एक ईमानदार बेचैनी ! विस्थापन के इन  वर्षों में यह बेचैनी, अपनी तेज़ी और प्रभाव खोने लगी है . विस्थापित जीवन ने हमारे साथ एक अच्छाई भी की है. हमारी दिमागी खाल कुछ और मोटी हो गई है.  छोटे छोटे कंकर पत्थर अब  बे असर ही निकल जाते हैं.. क्रमशः