शनिवार, 25 सितम्बर 2010
कोई भी किताब आपको कुछ नहीं देती.. आप जो लेना चाहते हैं ले लेते हैं ... आप क्या लेना चाहते हैं; इस पर निर्भर करता है कि आपको क्या सिखाया गया है .. जब आप इस सीखे हुए से मुक्त होकर, निष्पक्ष होकर, किताब
से कुछ ले पाते हैं.. उतना ही आपका अपना होता है.. इसी के आधार पर आप में
किताब-ऐ -जीस्त को पढ़ने की कुव्वत पैदा हो पाती है ... यह समझ लिया जाना
चाहिए.. जिंदगी से बड़ी न कोई किताब थी, न है, न होगी ..जिसने जिंदगी की किताब नही पढ़ी, उसमे इबादत की पात्रता भी विकसित नहीं हो पाती और यदि आपकी जिंदगी में इबादत नहीं है तो वह मिटटी है..
अगर
एक किताब अल्लाह के फरमान से है तो दुनिया की सारी किताबें भी अल्लाह के
फरमान से हैं क्योंकि वह एक है और उसी के फरमान से सब होता है ..ये किताबें
आपकी मदद के लिए हैं आप पर लादे जाने के लिए नहीं हैं
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