शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009
बूँद बूँद पहाड़ सा दर्द
जब रिसता है
तुम लेती हो जन्म
जानता हूँ
पत्थरों की पछाड़ से
चट्टानों की कोख से
उगाहते हुए
पहाड़ की मिटटी का कुअरापन
कैसे निकलती फलांगती
अल्हड सी गुजरती हो
धरती के घावों पर रखती मरहम
लेकिन नदी
कैसा लगता है
किसी खूंखार मोड़ पर
सभ्यता की कत्लगाहों से
और कत्लगाहों की सभ्यता से
निकले रक्त का
तुझमें आ मिलना !
कैसी लगती है
अपने भीतर मचलती
मछलियों की अपमृत्यु
कैसा लगता है
धरती का पाप गरल धोना
और समुद्र भर रोना
सच कहना नदी ॥ .
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