किसी दोस्त सी उतरती थी
कहवों और कह्कहों के बीच
इक शाने बे नियाजी के साथ
सेबों को बाँटती लालिमा
धान को जीवन के गीत
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी
जैसे आडिट की कोई
मुहीम चली थी आसमानों में
जैसे पूछ रही थी
मेरी इस घाटी को रक्तरंजित करने का
मेरे ही बन्दों को बेघर
दरबदर करने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया था
बर्फ जो गिरी थी इस बार
जैसे पहाड़ों के पास अपने
दाग धोने के लिए भी बचा नहीं था पानी
बर्फ जो हर बार
किसी दोस्त सी उतरती थी
इक शाने बे नियाजी के साथ
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी
सन्दर्भ :- कश्मीर से विस्थापन के बाद किसी एक साल बर्फ ने अपना तांडव दिखाया था कश्मीर में
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें