मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009
मैं ऐसी ही भटकी हुई कविताओं का कवि हूँ
मेरी कविताओं की वेश भूषा
जिक्र मत करो
उनके बालों को
कंघी भी नसीब नहीं होती
वह तो बस तडके उठती हैं
कुछ बचा खुचा मिला खा लेती हैं
अक्सर भूखी ही
निकल पड़ती हैं काम पर
काम उनका क्या
खाली बोरों में इधर उधर की खबरें
कुछ फेंके गये प्लास्टिक शब्द
उनके हाथ में एक छड भी होती है
जिसके सिरे पर
मिकनातीस का टुकड़ा लगा रहता है
रास्ते के कील कांटे
साफ करती हैं मेरी कविताएँ
मेरी कविताएँ स्कूल नहीं जातीं
बक्सा वैनों में बैठ कर
उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती
इतना काम है उनके पास
सिर पर उठाये आसमान
व्यर्थ से अर्थ छानती हैं मेरी कविताएँ..
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