गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

जिनका कोई शीर्षक नहीं होता

मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009


जिनका  कोई  शीर्षक  नहीं  होता
मैं  ऐसी   ही  भटकी  हुई  कविताओं  का  कवि  हूँ

मेरी  कविताओं  की  वेश  भूषा
जिक्र  मत  करो  
उनके  बालों  को
कंघी  भी  नसीब  नहीं  होती
वह  तो  बस  तडके  उठती  हैं
कुछ  बचा  खुचा  मिला  खा  लेती  हैं
अक्सर  भूखी  ही
निकल  पड़ती  हैं  काम  पर

काम  उनका  क्या
खाली  बोरों  में  इधर  उधर  की  खबरें
कुछ  फेंके  गये  प्लास्टिक  शब्द

उनके  हाथ  में  एक  छड  भी  होती  है
जिसके  सिरे  पर
मिकनातीस  का  टुकड़ा   लगा  रहता  है
रास्ते  के  कील  कांटे
साफ  करती  हैं  मेरी  कविताएँ

मेरी  कविताएँ  स्कूल  नहीं  जातीं
बक्सा  वैनों   में  बैठ  कर
उन्हें  फुर्सत  ही  नहीं  मिलती
इतना काम  है  उनके  पास

सिर   पर  उठाये आसमान
व्यर्थ  से  अर्थ   छानती   हैं  मेरी   कविताएँ..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें