यह जो
डरा डरा खोया सा
कुछ न कुछ
पाने की चाह में मारा मारा
अदृश्य रस्सियों में बंधा
सोचता ही रहता
कुछ न कुछ
हर समय
यह जो
कदम भर भी
चल नहीं पाता
और नाप आता है
ब्रह्मांडीय दूरियां
देख नहीं पाता कुछ भी
सजाता रहता
ध्वनियों की
चित्रों की
शब्दों की दुनिया
यह जो .. .. ..
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