गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मैं एक साथ


मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ

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