मैं समुद्र ही हो सकता था
गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
तुम्हें पुकारते हुए
बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010
तुम्हें पुकारते हुए
जिनसे होती है मुलाक़ात
वे मेरे दिल की तहों में छिपे राज़ हैं!
या
भीगने को बेताब मौसम में
अबाबीलों के बच्चों की उड़ान!
या
दूर किसी पहाड़ में बसे
गाँव के लोगों के भोले डर
जो शहरी उजालों से डरतें हैं !
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें