सोमवार, 2 दिसंबर 2013

विस्साव शिम्बोर्स्का

अद्भुत तुम !
अनिंद्य विश्वसुन्दरी !
अपनी उम्र और तमाम झुर्रियों के साथ 

हाँ तुम !
एक सम्पूर्ण स्त्री जो सोच सकती है 
सोच की हर हद को 
पुर-खामोश अदा के साथ 
तोड़ भी सकती है !

कहा था कवि ने 
वह स्त्री तुम्हें मार सकती है 
और फिर जिला भी सकती है 
कुछ ऐसी ही हो... विस्साव शिम्बोर्स्का !

कहते हैं 
स्त्री के गुण 
पुरुष में आ जाएँ 
तो उसे संत बना देते हैं 

और पुरुष के गुण 
स्त्री में उतर आयें 
तो कहर ढा देते हैं 

कहर की मारी 
दुखिया बेचारी इस दुनिया में 
तुम जो बांटती रही हो मरहम !

ओ विस्साव !
तेरे एहसास तैरेंगे हवाओं में 
और दुनिया के हर सत्ताधीश को 
एक ना एक दिन करनी होगी घोषणा 
पृथ्वी के नक्शे पर 
सरहदें अब जारी नहीं रह सकतीं !

आएगा 
वह दिन भी आएगा 
आने वाला समय 
हमारे जैसा पागल नहीं होगा !

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