१.
वह जो बैठा
सत्ता की ऊंची अटारी
देखता तमाशा
कैसे बेबस वानरसेना
बनाती है कागज के पुतले
ऊंचे से ऊंचे
बुराई पर
अच्छाई की जीत का
जश्न मनाती है
सहस्त्रग्रीवी रावण के ठहाके
पटाखों में गूँज उठते हैं
हमें लगता है
रावण जल रहा है...
२.
रावण
नहीं जलता कभी
उसकी नाभि में है
सत्ता-अभिमंत्रित
अमृत-कुण्ड
“मैं और
मेरा-परिवार”का
मेरा-परिवार”का
दुर्दम्य अहंकार
शोषण.. षड्यंत्र
शोषण.. षड्यंत्र
३.
सत्तासीन होने के बाद
खुला राम के समक्ष
सत्ता का रहस्य
पर हो चुकी थी देर
(कीमत जानकी को
चुकानी पड़ी)
आता रहा उन्हें याद
वह उन्मुक्त वन-जीवन
प्रकृति का परिवेश
सब के सब दरवेश
नित्य नयी चुनौतियां
तरो-ताज़े समाधान
और कहाँ यह
सिंहासनी
सिंहासनी
नैतिकता
नियम-धर्म-पाखण्ड
सिद्धांतों, आदर्शों में लिपटे
नकली, खोखले बंधन
तभी तो लिया
कृष्णावतार
कृष्णावतार
किया चीरहरण.. दिया वस्त्र-दान
पर सभ्यता के पाखंड को
कौन कैसे बाँचे अनकही
गीता-रामायण !
गीता-रामायण !
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