मैं
परमाणु को देखूं
या
प्रकाशाब्धियों-पूर्व
शुद्ध ऊर्जा में हुए उस
महा-महा-विस्फोट को देखूं
या
इन छोरों में कहीं टंगे से
अपने इस
अस्तित्व-हीन
अस्तित्व को देखूं ..
या
अपने ही ज्ञान में बंधे
परम अज्ञान को देखूं ..
परम बोध की
अबोधता में लौट चलूँ ..
या
गति में
अगति का नियंत्रण देखूं ..
आखिर
हुआ क्या है मुझे
खुद से खुद की
छुपा-छुपाई का
यह क्या खेल
खेलता रहता हूँ ?
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