सोमवार, 2 दिसंबर 2013

भेड़


मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़
मिमियाते रहते हैं दिन रात..
भेड़ होभीड़ में जीना सीखो..
देखने..
‘कुछ और होने’ के ख़्वाब...
पाप है..
गुनाह है..
कुफ्र-ओ-बगावत है

भीड़ से कट के चलोगे..कट जाओगे
भीड़ से हट के चलोगे...बंट जाओगे

नहीं जानते बेचारे
भीड़ या भीड़ से बचकर..
कटना उनकी नियति है...

मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़

कितनी मालदार आसामी हूँ मैं

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