सुना है
कभी चाँद पर
रहा करती थी एक बुढिया
चरखा कातने वाली बुढिया
चरखे पर काता करती थी
पृथ्वी के बच्चों के लिए
रंग-बिरंगी चमकती चटकती
चटपटी कहानियाँ
जिनमें डरे हुए खरगोशों की
बहादुरी के किस्से हुआ करते थे
बहादुरी के किस्से हुआ करते थे
मूर्खाधिराज शेर ..
दुम तान कर भागते
दुम तान कर भागते
हिरणियों के छौने
सुस्त-रफ्तार जीतने वाले कछुए
और भी पता नहीं क्या कुछ ..
और अचानक वह बुढिया
चाँद से गायब हो गई
(कर दी गई / अगवा हो गई
किसीको नहीं मालूम)
हमने भेजा चाँद पर
नील-आर्म-स्ट्रांग
नील-आर्म-स्ट्रांग
और उसके पीछे
और भी कितनों को
उस बुढिया की तलाश में
पर वह होती वहाँ तो मिलती
सिरमुई
पता नहीं कहाँ जा छिपी है
उड़ती खबर यह है
किसी हे खता काफूर के नाम से
वह बुढिया
पृथ्वी के इस
सबसे गुंजान इलाके में
कोई जाल बिछा रही है
कोई जाल बिछा रही है
गरीब, अनपढ़ जाहिल गंवार
हिंदुस्तानियों को
चन्द्रिले सपने दिखा कर
नावा बना रही है
खबर पक्की हो
तो खबर करना
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