प्रिय अपनत्व
पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ
‘भवसागर’ पढा और चौंक गया
मास्टर् इन सोशिओलोजी से
ऐसी आशा न थी
विज्ञान
विश्वासों पर
अपनी यात्रा तय नहीं करता
क्या आप सचमुच पहचानती हैं
भवसागर क्या है ?
चाहूँगा ..
ईश्वर के बारे में भी
अपनी धारणा को विकास दें
जो कि मूलतः ज्ञान और प्रकाश है
(अज्ञान रूप और तिमिर भी हो सकता है)
एक यात्रा,
निरंतर प्रगतिशील, सतत प्रयोगधर्मी
निरंतर प्रगतिशील, सतत प्रयोगधर्मी
विश्वास मायने
निष्कर्ष तक पहुंचना और ठहर जाना
लेकिन,
हर ठहराव ईश्वर के विरोध में
अज्ञान और अंधेरों में रुकना है
सो ईश्वर के सहयोगी बनिए
यह सब इसलिए
क्योंकि आपमें
एक सार्थक पहल की सम्भावना है
हो सके तो बात आगे बढाइये
प्रश्न उठाथिये
एक कवि मूलतः प्रश्न ही होता है
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