मैं समुद्र ही हो सकता था
सोमवार, 17 जून 2013
कितनी भली थी वह रात
जब वह पहली बार मिली थी
अलकें कुछ बिखरी-बिखरी
नूरानी चेहरे पर
यही हँसी थीं
उस रात
जब कौंधी थी उस
पहले चुम्बन की बिजली
पलकों में कैसी दावत थी
वह कैसी खिली-खिली थी
कितनी भली थी वह रात
जब वह पहली बार मिली थी
1 टिप्पणी:
अभिषेक आर्जव
10 अक्टूबर 2013 को 9:37 am बजे
कितनी आसानी से कितनी कठिन सी बात लिख दी गयी ! ! !
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कितनी आसानी से कितनी कठिन सी बात लिख दी गयी ! ! !
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