सोमवार, 2 दिसंबर 2013

मेरे दादा के समय के वृन्दावन

ओ वृन्दावन, मेरे दादा के समय के प्यारे वृन्दावन ! फिर याद आ रहे हो ! याद आ रहा है ..चन्द्रावली मारवाड़ी भोजनालय ...याद आ रही हैं वे ब्रजवासी माताएं ... वह गोरी राधावल्लभ  तिलक वाली ..और वह  काली कलूटी गौडीय तिलक बंगालन ..पोपले मुंह पर चील की चोंच सी नाक ..धनुष की कमान सी झुकी कमर...बोलती तो लगता खिड़कियाँ खडकने लगी हैं..शायद अभी चिमटा उठा कर दे मारेगी सर पर ...पर खाना किस प्यार से खिलाती थीं दोनों!  ...लकड़ी के चूल्हे पर सिकी एक-एक चपाती ..वह दाल, डुबकी मारो तो दाना ना मिले ...फिर भी पता नहीं क्या स्वाद !...वह सूखी सब्जी और धनिया पोदीना की चटनी ..बस इतना ही ...पर उस थाली की सादगी में वह पवित्र स्नेह ..!!
सब मिलेगा आपको इस पांच तारा में ...पर वह सादगी में घुला  स्नेह कहाँ से लाओगे ? 

वह दिन भी आएगा

अद्भुत तुम !
अनिंद्य विश्वसुन्दरी !
अपनी उम्र और तमाम झुर्रियों के साथ 

हाँ तुम !
एक सम्पूर्ण स्त्री जो सोच सकती है 
सोच की हर हद को 
पुर-खामोश अदा के साथ 
तोड़ भी सकती है !

कहा था कवि ने 
वह स्त्री तुम्हें मार सकती है 
और फिर जिला भी सकती है 
कुछ ऐसी ही हो... विस्साव शिम्बोर्स्का !

कहते हैं 
स्त्री के गुण 
पुरुष में आ जाएँ 
तो उसे संत बना देते हैं 

और पुरुष के गुण 
स्त्री में उतर आयें 
तो कहर ढा देते हैं 

कहर की मारी 
दुखिया बेचारी इस दुनिया में 
तुम जो बांटती रही हो मरहम !

ओ विस्साव !
तेरे एहसास तैरेंगे हवाओं में 
और दुनिया के हर सत्ताधीश को 
एक ना एक दिन करनी होगी घोषणा 
पृथ्वी के नक्शे पर 
सरहदें अब जारी नहीं रह सकतीं !

आएगा 
वह दिन भी आएगा 
आने वाला समय 
हमारे जैसा पागल नहीं होगा !

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

नदी की धारा में



बूँद-बूँद जल
भंवर बुनता है

समय की धारा में
एक-एक पल
रचता है अंध-विवर...

और शब्द ?
शब्द ब्रह्म है साक्षात
जो मांगो वही देता है...!

सोमवार, 17 जून 2013

कितनी भली थी वह रात



जब वह पहली बार मिली थी
अलकें कुछ बिखरी-बिखरी
नूरानी चेहरे पर 
यही हँसी थीं
उस रात  
जब कौंधी थी उस
पहले चुम्बन की बिजली
पलकों में कैसी दावत थी
वह कैसी खिली-खिली थी

कितनी भली थी वह रात
जब वह पहली बार मिली थी

शनिवार, 15 जून 2013

शुक्रवार, 14 जून 2013

मुझे मिले

उसने कहा 
जीवन संघर्ष है 

मुझे लगा 
जीवन प्रेम है 

और हम 
निकल पड़े 
अपनी अपनी डगर 

उसे क्या मिला 
मुझे नहीं मालूम 

मुझे मिली आँखें 
तुम 
और यह पंख ...!
***

राहें

वे कुएं पोखर हैं
जिन्हें बंधन सुहाते हैं

नदी सागर
अपनी राहें खुद बनाते हैं... !!