ओ वृन्दावन, मेरे
दादा के समय के प्यारे वृन्दावन ! फिर याद आ रहे हो ! याद आ रहा है
..चन्द्रावली मारवाड़ी भोजनालय ...याद आ रही हैं वे ब्रजवासी माताएं ... वह
गोरी राधावल्लभ तिलक वाली ..और वह काली कलूटी गौडीय तिलक बंगालन ..पोपले
मुंह पर चील की चोंच सी नाक ..धनुष की कमान सी झुकी कमर...बोलती तो लगता
खिड़कियाँ खडकने लगी हैं..शायद अभी चिमटा उठा कर दे मारेगी सर पर ...पर खाना
किस प्यार से खिलाती थीं दोनों! ...लकड़ी के चूल्हे पर सिकी एक-एक चपाती
..वह दाल, डुबकी मारो तो दाना ना मिले ...फिर भी पता नहीं क्या स्वाद
!...वह सूखी सब्जी और धनिया पोदीना की चटनी ..बस इतना ही ...पर उस थाली की
सादगी में वह पवित्र स्नेह ..!!
सब मिलेगा आपको इस पांच तारा में ...पर वह सादगी में घुला स्नेह कहाँ से लाओगे ?
सब मिलेगा आपको इस पांच तारा में ...पर वह सादगी में घुला स्नेह कहाँ से लाओगे ?