सोमवार, 2 दिसंबर 2013

भेड़


मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़
मिमियाते रहते हैं दिन रात..
भेड़ होभीड़ में जीना सीखो..
देखने..
‘कुछ और होने’ के ख़्वाब...
पाप है..
गुनाह है..
कुफ्र-ओ-बगावत है

भीड़ से कट के चलोगे..कट जाओगे
भीड़ से हट के चलोगे...बंट जाओगे

नहीं जानते बेचारे
भीड़ या भीड़ से बचकर..
कटना उनकी नियति है...

मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़

कितनी मालदार आसामी हूँ मैं

कुछ तो है..

कुछ तो है..
      मौसम ! 
तनहाई के साज पर
कोहरे का राग क्यों
बाहर जो फाग है..
भीतर की आग क्यों
आखिर
यह क्या सांठ-गाँठ है
कुछ तो कहती जा
ऐऽऽ रीऽऽ कविता
...ओऽऽ मौसम !
शर्मा गएऽऽ... क्या ?

विस्साव शिम्बोर्स्का

अद्भुत तुम !
अनिंद्य विश्वसुन्दरी !
अपनी उम्र और तमाम झुर्रियों के साथ 

हाँ तुम !
एक सम्पूर्ण स्त्री जो सोच सकती है 
सोच की हर हद को 
पुर-खामोश अदा के साथ 
तोड़ भी सकती है !

कहा था कवि ने 
वह स्त्री तुम्हें मार सकती है 
और फिर जिला भी सकती है 
कुछ ऐसी ही हो... विस्साव शिम्बोर्स्का !

कहते हैं 
स्त्री के गुण 
पुरुष में आ जाएँ 
तो उसे संत बना देते हैं 

और पुरुष के गुण 
स्त्री में उतर आयें 
तो कहर ढा देते हैं 

कहर की मारी 
दुखिया बेचारी इस दुनिया में 
तुम जो बांटती रही हो मरहम !

ओ विस्साव !
तेरे एहसास तैरेंगे हवाओं में 
और दुनिया के हर सत्ताधीश को 
एक ना एक दिन करनी होगी घोषणा 
पृथ्वी के नक्शे पर 
सरहदें अब जारी नहीं रह सकतीं !

आएगा 
वह दिन भी आएगा 
आने वाला समय 
हमारे जैसा पागल नहीं होगा !

सोमाद्री

बेचारा मेरा ब्लॉग
कभी-कभार कोई भूला-भटका राही 
उधर से निकल पाता है..
आज तो कमाल हो गया  
सबसे पहले सोमाद्री नाम
अपने आप में कविता  
उस पर ब्लॉग का नाम सोमरस
उस पर आपकी कविता ! 
अभी-अभी किसी ने मुझे
White wine
पीने कि सलाह दी थी..
इस त्रिवेणी के बाद कैंसल .. 
टिपण्णी के लिए
धन्यवाद ..

यह कैसी  दुनिया
जहाँ प्यार छाते में छुपकर
जंग और दंगे खुले आम
इस तस्वीर ने
दिल की ट्राफी जीत ली है सोमाद्री

बियर को ले कर
कुछ कहना तो भूल ही गया ..
मेरे बस में हो
तो सारी शराब सारी कोकाकोला
सारे ठन्डे पेय बंद करवा दूं
बियर मुफ्त करवा दूं
छबीलें लगवा दूं
पियो बियर ते हो जाओ बागी
घर दे जीन गे अपने भागी
वैसे मैंने कभी ज्यादा नहीं पी
ज्यादा क्या कम भी नहीं पी
शौक है पीने का
मुफ्त मिले तो
यह तस्वीर जो दिख गयी
सुना है दिल दिमाग को ठंडा रखती है
सोमरस
शायद इसी का वैदिक नाम था
कई बार सोचता हूँ
अगर बियर मुफ्त हो जाये
 इसकी छबीलें लग जाएँ
तो शायद दृश्य बदल जाये
दंगे और जंग
छातों के नीचे होने लगे
और प्यार खुले आम  .
.पियो बियर ते करो प्यार
दन्गाइयां नू जूतियाँ चार
वैसे मैंने कभी
ज्यादा नहीं पी
ज्यादा क्या कम भी नहीं पी
कुल एकाध बार जीवन में
शौक है पीने का
मुफ्त मिले तो
यह तस्वीर जो दिख गयी
सुना है
दिल दिमाग को ठंडा रखती है  
लो बंदा तो गया
नाम पढ़ा और बहक लिया 

@ताज महल या तेजोमहालय
जिंदगी जीने का
कोई सही सलीका सिखा रहा है ?
उपद्रवों और दुखों से मुक्त होकर
जीने कि कोई राह बता रहा है ?
यदि नहीं
तो इनकी कीमत
कूड़े से अधिक नहीं है
हिंदू होना, मुस्लमान होना
या कमुनिस्ट होना या कुछ और होना
सब होना कूड़ा है
यदि
इंसान होना छूट जाता है

जीवन प्यार ईश्वर और स्वतंत्रता
इतना ही सत्य है
और
 इन्हें किसी इमारत
किसी इतिहास
किसी राजनीती कि जरूरत नहीं  !
 


अपनत्व ..

प्रिय अपनत्व 
पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ
 ‘भवसागर पढा और चौंक गया
 मास्टर् इन सोशिओलोजी से
ऐसी आशा न थी
विज्ञान
विश्वासों पर 
अपनी यात्रा तय नहीं करता
 क्या आप सचमुच पहचानती हैं
भवसागर क्या है ?
चाहूँगा ..
ईश्वर के बारे में भी
अपनी धारणा को विकास दें
जो कि  मूलतः ज्ञान और प्रकाश  है
(अज्ञान रूप और तिमिर भी हो सकता है)
एक यात्रा, 
निरंतर प्रगतिशील,  सतत प्रयोगधर्मी  
 विश्वास मायने
निष्कर्ष तक पहुंचना और ठहर जाना  
लेकिन,
हर ठहराव  ईश्वर के विरोध में
 अज्ञान और अंधेरों में रुकना है  
सो  ईश्वर के सहयोगी बनिए
यह सब इसलिए 
क्योंकि आपमें
एक सार्थक पहल की सम्भावना है 
हो सके तो बात आगे बढाइये   
प्रश्न उठाथिये
एक कवि मूलतः प्रश्न ही होता है 

मेरे दादा के समय के वृन्दावन

ओ वृन्दावन, मेरे दादा के समय के प्यारे वृन्दावन ! फिर याद आ रहे हो ! याद आ रहा है ..चन्द्रावली मारवाड़ी भोजनालय ...याद आ रही हैं वे ब्रजवासी माताएं ... वह गोरी राधावल्लभ  तिलक वाली ..और वह  काली कलूटी गौडीय तिलक बंगालन ..पोपले मुंह पर चील की चोंच सी नाक ..धनुष की कमान सी झुकी कमर...बोलती तो लगता खिड़कियाँ खडकने लगी हैं..शायद अभी चिमटा उठा कर दे मारेगी सर पर ...पर खाना किस प्यार से खिलाती थीं दोनों!  ...लकड़ी के चूल्हे पर सिकी एक-एक चपाती ..वह दाल, डुबकी मारो तो दाना ना मिले ...फिर भी पता नहीं क्या स्वाद !...वह सूखी सब्जी और धनिया पोदीना की चटनी ..बस इतना ही ...पर उस थाली की सादगी में वह पवित्र स्नेह ..!!
सब मिलेगा आपको इस पांच तारा में ...पर वह सादगी में घुला  स्नेह कहाँ से लाओगे ? 

वह दिन भी आएगा

अद्भुत तुम !
अनिंद्य विश्वसुन्दरी !
अपनी उम्र और तमाम झुर्रियों के साथ 

हाँ तुम !
एक सम्पूर्ण स्त्री जो सोच सकती है 
सोच की हर हद को 
पुर-खामोश अदा के साथ 
तोड़ भी सकती है !

कहा था कवि ने 
वह स्त्री तुम्हें मार सकती है 
और फिर जिला भी सकती है 
कुछ ऐसी ही हो... विस्साव शिम्बोर्स्का !

कहते हैं 
स्त्री के गुण 
पुरुष में आ जाएँ 
तो उसे संत बना देते हैं 

और पुरुष के गुण 
स्त्री में उतर आयें 
तो कहर ढा देते हैं 

कहर की मारी 
दुखिया बेचारी इस दुनिया में 
तुम जो बांटती रही हो मरहम !

ओ विस्साव !
तेरे एहसास तैरेंगे हवाओं में 
और दुनिया के हर सत्ताधीश को 
एक ना एक दिन करनी होगी घोषणा 
पृथ्वी के नक्शे पर 
सरहदें अब जारी नहीं रह सकतीं !

आएगा 
वह दिन भी आएगा 
आने वाला समय 
हमारे जैसा पागल नहीं होगा !