बुधवार, 20 अप्रैल 2011
एक उदास दिन की डायरी
फिर वजह-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबा किया हुए... ग़ालिब
इसे सनक कहूँ या मनोरोग, लिखने का शौक जनून की हदों को छूने लगा है . शांत साहब ने कहा भी था,'क्यों बर्बाद होना चाहते हो?' ..पता नहीं भीतर क्या हलचल है, लिखता हूँ फाड़ देता हूँ .
अग्निशेखर ने कहा था, 'लेखक बुनकर होता है, सम्पादक दर्जी, दोनों को एक साथ नहीं रहना चाहिए.' अपने भीतर तो दोनों एक साथ डटे हुए हैं . बेचारा कबीर, दिन भर में कुछ पंक्तियाँ बुनता है और मास्टर जी कैंची लेकर आ जाते है. मास्टर जी कुछ दिन जरा घूम फिर आइये...
मीना कुमारी की पंक्तियाँ याद आ रही है
जागी हुई आँखों में कांच से चुभते हुए ख़्वाब
रात ऐसे ही दीवानों की बसर हुआ करती है
दूर कुत्तों के भौंकने में गीदड़ों की हुआ हुआ में 'राग दूरदर्शन' रात के इस सन्नाटे में रंग भर रहे हैं
ए झूम जागना रात दा बहुत मंदा
या कोई जागदा ए पहरे दार राती
या फिर जागदा ए दुखिया मरीज कोई
या फिर जागदा ए चोर चकार राती
या फिर जागदा ए इश्क दी रमज वाला
या फिर जागदा ए परवरदिगार राती
श्याम इनमें से तुम कौन जो इतनी रात गए जाग रहे हो?
बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011
एक उदास दिन की डायरी -२
माँ याद आ रही है . चौथाई सदी पहले इसी दिन दुनिया से विदा हुई थी. अपने अक्खडपन में कितना दुखी किया था उसे . शायद उसी का फल है . सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं . शायद पूरा जीवन यूं ही चलेगा .
"शापित सा इस जीवन का मैं ले कंकाल भटकता हूँ
इसी खोखलेपन में जाने क्या खोजता अटकता हूँ .."---जयशंकर प्रसाद
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
एक उदास दिन की डायरी -३
कल की ऊंघ में जो लिखा, देख रहा हूँ . ख़ारिज होने के लायक भी नहीं. जो लिखा गया ठीक ही है. कम से कम अभ्यास तो नहीं छूटा.
सोचता हूँ कुछ लोगों के लिए लिखना सांस लेने जितना सहज क्यों होता है ? मुझ जैसों के लिए, यह इतने अभ्यास का विषय क्यों है? तिस पर भी वह बात तो बनती ही नहीं ! सारे तीर नीमकश ही निकल जाते है ! जहां अभ्यास छूटा लिखना भूल गए ! लिखने के लिए भीतर एक छटपटाहट चाहिए ! एक ईमानदार बेचैनी ! विस्थापन के इन वर्षों में यह बेचैनी, अपनी तेज़ी और प्रभाव खोने लगी है . विस्थापित जीवन ने हमारे साथ एक अच्छाई भी की है. हमारी दिमागी खाल कुछ और मोटी हो गई है. छोटे छोटे कंकर पत्थर अब बे असर ही निकल जाते हैं.. क्रमशः