गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

उदास दिन की डायरी

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी

(पिछली सदी के अंतिम दशक में लिखे गए कुछ पन्ने)
फिर वजह-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबा किया हुए... ग़ालिब
इसे सनक कहूँ या मनोरोग, लिखने का शौक जनून की हदों को छूने लगा है . शांत साहब ने कहा भी था,'क्यों बर्बाद होना चाहते हो?' ..पता नहीं भीतर क्या हलचल है, लिखता हूँ फाड़ देता हूँ .
अग्निशेखर ने कहा था, 'लेखक बुनकर होता है, सम्पादक दर्जी, दोनों को एक साथ नहीं रहना चाहिए.' अपने भीतर तो दोनों एक साथ डटे हुए हैं . बेचारा कबीर, दिन भर में कुछ पंक्तियाँ बुनता है और मास्टर जी कैंची लेकर आ जाते है. मास्टर जी कुछ दिन जरा घूम फिर आइये...
मीना कुमारी की पंक्तियाँ याद आ रही है
जागी हुई आँखों में कांच से चुभते हुए ख़्वाब
रात ऐसे ही दीवानों की बसर हुआ करती है
दूर कुत्तों के भौंकने में गीदड़ों की हुआ हुआ में 'राग दूरदर्शन' रात के इस सन्नाटे में रंग भर रहे हैं
ए झूम जागना रात दा बहुत मंदा
या कोई जागदा  ए पहरे दार राती
या फिर जागदा ए दुखिया मरीज कोई
या फिर जागदा ए चोर चकार राती
या फिर जागदा ए इश्क दी रमज वाला
या फिर जागदा ए परवरदिगार राती
श्याम इनमें से तुम कौन जो इतनी रात गए  जाग रहे हो?        


बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -२

दुनिया होली खेल रही है ..मैं घर में उदास दुबका बैठा हूँ ..भीतर शायद कोई मकड़ी है जाले बुनती हुई . कितना काटूं; कितना साफ़ करूं ? मुझे मेरी आदतों ने मारा है . आस्थाएं भंग, विशवास गायब ! कारण खोजता हूँ तो बात पीढ़ियों तक जा पहुँचती है.
माँ याद आ रही है . चौथाई सदी पहले इसी दिन दुनिया से विदा हुई थी. अपने अक्खडपन में कितना दुखी किया था उसे . शायद उसी का फल है . सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं . शायद पूरा जीवन यूं ही चलेगा .
"शापित सा इस जीवन का मैं ले कंकाल भटकता हूँ
इसी खोखलेपन में जाने क्या खोजता अटकता हूँ .."---जयशंकर प्रसाद

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -३

सिर भारी है. नींद का हमला. फिर भी लिखना है ... क्या लिखूं ? मन के आकाश में कितने ही सपने पतंगों से उड़ते रहते हैं. आज शायद सब के सब हड़ताल पर हैं. मनुहार करके शेखर से "इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी" लाया हूँ. केवल कविताएँ पढ़ने के लिए. कुछेक पढीं, पर ऊब गया हूँ. मन एकाग्रता के मूड में नहीं. बच्चे वैष्णो देवी गए हैं. सिर सिरहाने की खोज में ...कलम कह रही है ...छोडो कल देखना . . . .  .
कल की ऊंघ में जो लिखा, देख रहा हूँ . ख़ारिज होने के लायक भी नहीं. जो लिखा गया ठीक ही है. कम से कम अभ्यास तो नहीं छूटा.
सोचता हूँ कुछ लोगों के लिए लिखना सांस लेने जितना सहज क्यों होता है ? मुझ जैसों के लिए, यह इतने अभ्यास का विषय क्यों है? तिस पर भी वह बात तो बनती ही नहीं ! सारे तीर नीमकश ही निकल जाते है ! जहां अभ्यास छूटा लिखना भूल गए ! लिखने के लिए भीतर एक छटपटाहट चाहिए ! एक ईमानदार बेचैनी ! विस्थापन के इन  वर्षों में यह बेचैनी, अपनी तेज़ी और प्रभाव खोने लगी है . विस्थापित जीवन ने हमारे साथ एक अच्छाई भी की है. हमारी दिमागी खाल कुछ और मोटी हो गई है.  छोटे छोटे कंकर पत्थर अब  बे असर ही निकल जाते हैं.. क्रमशः

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

फलो फूलो ओ पृथ्वी


शायद
यह पृथ्वी
मरू की अनंतता में
जीवन की आहट है

शायद
किसी और सौरमंडल के
किसी ग्रह उपग्रह को
मेरी प्रतीक्षा है

शायद
किसी दिन
हरा भरा होगा ब्रह्मांड

फलो फूलो ओ पृथ्वी


2 दिसम्बर 2009

प्यार



क्या प्यार हीरा है
इतना चमकदार
इतना कठोर

आखिर तो
कालिख से ही
जन्म लेता है

इससे
और अधिक
क्या उम्मीद
की जा सकती है

विलोम भाव

मैं आदमी
भले ही गाता रहूँ
अपनी महानता के गीत
पर सच यह है कि मैं
जीवन, प्यार,
ईश्वर और स्वतंत्रता का
विलोम भाव हूँ

कितना कितना रक्तपात
कितना अश्रुपात किया है
करवाया है मैंने
फिर भी 
यह धरती सहे जाती है
सूर्य दिए जाता है मुझे जीवन

सभ्य हो पाने की संभावना
बार बार टकराती है मुझसे
लौट लौट जाती है
इस गूँज के साथ
नहीं! अभी नहीं

मैं आदमी
भले ही गाता रहूँ
अपनी महानता के गीत
पर सच यह है .. मैं
जीवन, प्यार,
ईश्वर और स्वतंत्रता का
विलोम भाव हूँ

लौटते हुए

अब जब 
आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द की  
शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ 
वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण 
करती चली गई

ताकि लौट कर 
कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
और 
जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए

ताकि 
प्यार, प्यार हो
न कि बंधन

ईश्वर 
ईश्वर हो
न कि जड़ों तक 
उतरा हुआ डर

स्वतंत्रता 
स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और
 कानून के मछुआरे जाल


ताकि 
जीवन, जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल

हम तो आदमी हैं

जिंदगी जब 
सिद्धांतों और आदर्शों में 
अटक जाती है 


किताबों और उद्धेश्यों में 
भटक  जाती है


 जिंदगी तब ..
जिंदगी नहीं 
गुलामी बन जाती है


गुलामी !  
आप जानते हैं 
पशुओं को भी स्वीकार्य नहीं 
हम तो आदमी हैं

मैं और मेरा समय

मैं और मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी तमाम कमजोरियों के साथ 

मैं और मेरा मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी पूरी ताकत के साथ 

मैं और मेरा समय 
क्या कभी दोस्त बन सकते हैं