गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
गीत
मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
भले ही उम्र अब मेरी जवां नहीं
भले ही दिल में वलवले तूफां नहीं
हैं आरजू के खंडहर हर तरफ
भले ही सर पे छत नहीं मकां नहीं
नहीं हैं पस्त हौसले मेरे अभी
भले ही मेरे मुह में जुबां नहीं
मैं ईंट ईंट बीन कर वक्त की
नई सदी को सच की राह मोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
मैं पर्वतों को लाँघ छोड़ आया हूँ
मैं दलदलों को नापतोल आया हूँ
हूँ रास्तों की मुश्किलों से बाखबर
मैं रास्तों को मंजिलों से जोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मार्तंड कुण्ड
मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009
लिखना चाहता हूँ एक अर्थमुक्त कविता
सिर धुनते रहें शब्द पकड़ने वाले
अर्थ उनके हाथ से फिसल फिसल जाएं
मार्तंड कुण्ड की मछलियों की तरह
मैने तो समुद्र खंगाले हैं
मुश्किलन बचा हूँ
शार्कों व्हेलों का निवाला बनने से
फिर मुझे यह मार्तंड कुण्ड
क्यों याद आते हो मार्तंड ! विस्थापन में
तेरा प्रतिनिधि मेरा मित्र कवि
है तो सही मेरे संग यहाँ मेरे पास
तेरे जल में किलोलती मछलियों सी उसकी कवितायें
कहीं भी रहूँ समुद्रों में
पर्वतों पर
आसमानों में
तेरे कुण्ड की मछलियाँ और
उसकी कवितायें मुझे खींच लाती हैं जमीन पर
आज तो बस जी चाहता है
जो जी में आये लिखता चलूँ
कोई पराकाष्ठा छू लूं
यह भी क्या
हर बार लिखते रहें हम
सोची समझी साजिशों सी कवितायेँ!
नदी
शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009
बूँद बूँद पहाड़ सा दर्द
जब रिसता है
तुम लेती हो जन्म
जानता हूँ
पत्थरों की पछाड़ से
चट्टानों की कोख से
उगाहते हुए
पहाड़ की मिटटी का कुअरापन
कैसे निकलती फलांगती
अल्हड सी गुजरती हो
धरती के घावों पर रखती मरहम
लेकिन नदी
कैसा लगता है
किसी खूंखार मोड़ पर
सभ्यता की कत्लगाहों से
और कत्लगाहों की सभ्यता से
निकले रक्त का
तुझमें आ मिलना !
कैसी लगती है
अपने भीतर मचलती
मछलियों की अपमृत्यु
कैसा लगता है
धरती का पाप गरल धोना
और समुद्र भर रोना
सच कहना नदी ॥ .
हे गणेश जी सबसे पहले आप ही की पूजा क्यों ?
शुक्रवार, 3 सितम्बर 2010
क्योंकि योजना का आकार प्रकार तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन, उसे पूरा करने का काम तो छोटे छोटे लोग ही करते हैं ना! इसीलिए मुझे ॠद्धि सिद्धि का देवता कहा गया है.. और कार्य योजना भी जब बनाओ तो मुदित-मन से बनाना ..यही मेरा मोदक-प्रिय होने का रहस्य है
.. अच्छा तो इस ब्लॉग के लिए तुमने कोई योजना बनाई है ?
.. अभी तो नहीं देव ..
.. तो चलो सबसे पहले यही काम करो ...कब, क्यों, कैसे, कहाँ.. सारे "क" वाले प्रश्न ले आओ ..जहां मुश्किल आये तो मुझसे पूछना ..भला !
जैसी आज्ञा देव...
सृजन (एक अनूदित रचना)
सोमवार, 6 सितम्बर 2010
डॉ के.एल .चौधरी की पुस्तक Enchanting world of infants से एक रचना creation का हिंदी अनुवाद -- अनुवादक श्यामजुनेजा
टूटा बांध
छूटा और बह निकला
.प्रसव पूर्व का वह प्रथम संकेत
जैसे रिक्त किया जाना
सतीसर का जल
उस महान ऋषि के द्वारा
घाटी को जन्म देने से पहले
कैसी थी यह
कुलबुलाती अकुलाहट तुम्हारी
अपने ही बूते चले आने की
मेरे पवित्र गर्भ की
नौ मासी कारा से बाहर
एक अभिनव यात्रा का प्रारंभ
कि कवच ही छेद डाला
अपने लघु कोमल
पादांगुष्ठ नख से
भेद डाले
सुरक्षा के जल घेरे
जो रचे थे मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे आसपास. ..
या की था यह
मेरे गर्भ का अश्रुसिक्त भाव
कि अब
अलग होने का समय आ गया है
जैसा की होता है सबके साथ
कोमल थे
प्रथम पीडा के स्पंदन
मधुर विश्रांत अंतरालों के साथ
और फिर
शक्तिमान तरंगों का नृत्य
वर्चस्व की होड़
जैसे अशांत समुद्र में लहरें
हर लहर
पहली से उतप्त उदग्र प्रचंड
किनारे से टकराने को व्याकुल
दर्द बडा और
तुम्हे धकेलते हुए बढ़ता गया
यह मेरे भीतर
तुम्हारी यात्रा के
अंतिम पडाव में एक प्रयास था
तुम्हारी सहायता के लिए
ताकि मैं तुम्हें बाँहों में भर सकूं
क्या हम दोनों ही थे
इतने उतावले अधीर
होने को एक दुसरे के सन्मुख
अपनी अपनी देह रचना के साथ
कि सिर के बल
तुम्हारी इस यात्रा में
पहले माथा दिखा.. न की शिरोप्रिष्ठ
और गर्भ द्वार पर अटक गया
आह
सृजन सरल नहीं होता
न ही
नकुछ से छलकता है कोई आनंद
इच्छाएं
तप के बिना सफल नहीं होतीं
समुद्र मंथन में ही तो फलता है
अमृत और विष
यह अग्नि परीक्षा का पल
आन पंहुचा था एक साथ
हम दोनों के लिए
मुझे ले जाया गया था प्रसूतिकक्ष में
ताकि शल्य द्वारा
तुम लाये जा सको बाहर
और इस प्रकार
तुम्हारा जन्म हुआ
जैसे किसी महाविस्फोट के बाद
जन्म लेती है सृष्टि
वह रक्त और स्वेद
और आंसू और पीडा के प्रवाह में
प्रकटा ज्योतिपुंज
जैसे किसी अनादिता को पार कर
मैंने सुनी तुम्हारी चीख
जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी
न जाने कब से
और मैंने मींच ली आँखें
एक परमानन्द में
अब मुझे
टाँके लगाये जा रहे थे
प्रस्तुति श्याम जुनेजा
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