गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

इससे पहले कि


इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में

इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें

इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे

उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद

साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल

कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो  लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व

इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं

ईश्वर

बृहस्पतिवार, जनवरी 07, 2010


जिन्होनें कहा
ईश्वर प्रकाश  है
उन्होनें यह न कहा
कितने गहन अंधेरों से भिड कर
उपजा यह प्रकाश

उन्होनें यह न कहा
न होने के विरोध में
होने की यात्रा है ईश्वर

उन्होनें यह भी  न कहा
ईश्वर अथक  प्रयोगधर्मिता  है
और हर ठहराव
ईश्वर के खिलाफ जाता है

मैं एक साथ


मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ

यह जो

सोमवार, जनवरी 11, 2010


यह जो
डरा डरा खोया सा
कुछ न कुछ
पाने की चाह में मारा मारा
अदृश्य रस्सियों में बंधा
सोचता ही रहता
कुछ न कुछ
हर समय

यह जो
कदम भर भी
चल नहीं पाता
और नाप आता है
ब्रह्मांडीय  दूरियां  
देख नहीं पाता कुछ भी
सजाता रहता
ध्वनियों  की
चित्रों की
शब्दों  की दुनिया

यह जो .. .. ..

प्यार और नफरत

रविवार, जनवरी 17, 2010


प्यार के बदले प्यार
सब करते हैं

नफरत के बदले नफरत
सब करते हैं

प्यार के बदले नफरत
कोई विरला ही करता है
जैसे तू

नफरत के बदले प्यार
विरलों में कोई विरला
जैसे मैं

गीत


मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

भले ही उम्र अब मेरी जवां नहीं
भले ही दिल में वलवले तूफां नहीं
हैं आरजू के खंडहर हर तरफ
भले ही सर पे छत नहीं मकां नहीं
नहीं हैं पस्त हौसले मेरे अभी
भले ही मेरे मुह में जुबां नहीं

मैं ईंट ईंट बीन कर वक्त की
नई सदी को सच की राह मोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं पर्वतों को लाँघ छोड़ आया हूँ
मैं दलदलों को नापतोल आया हूँ
हूँ रास्तों की मुश्किलों से बाखबर
मैं रास्तों को मंजिलों से जोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा

मार्तंड कुण्ड

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009


तुझे याद करते हुए
लिखना चाहता हूँ एक अर्थमुक्त कविता
सिर धुनते रहें शब्द पकड़ने वाले
अर्थ उनके हाथ से फिसल फिसल जाएं
मार्तंड कुण्ड की मछलियों की तरह
मैने तो समुद्र खंगाले हैं
मुश्किलन बचा हूँ
शार्कों व्हेलों का निवाला बनने से
फिर मुझे यह मार्तंड कुण्ड
क्यों याद आते हो मार्तंड ! विस्थापन में
तेरा प्रतिनिधि मेरा मित्र कवि
है तो सही मेरे संग यहाँ मेरे पास
तेरे जल में किलोलती मछलियों सी उसकी कवितायें
कहीं भी रहूँ समुद्रों में
पर्वतों पर
आसमानों में
तेरे कुण्ड की मछलियाँ और
उसकी कवितायें मुझे खींच लाती हैं जमीन पर
आज तो बस जी चाहता है
जो जी में आये लिखता चलूँ
कोई पराकाष्ठा छू लूं
यह भी क्या
हर बार लिखते रहें हम
सोची समझी साजिशों सी कवितायेँ!