गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर
इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में
इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें
इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे
उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद
साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल
कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व
इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर
यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं
मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ
गीत
मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
भले ही उम्र अब मेरी जवां नहीं
भले ही दिल में वलवले तूफां नहीं
हैं आरजू के खंडहर हर तरफ
भले ही सर पे छत नहीं मकां नहीं
नहीं हैं पस्त हौसले मेरे अभी
भले ही मेरे मुह में जुबां नहीं
मैं ईंट ईंट बीन कर वक्त की
नई सदी को सच की राह मोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
मैं पर्वतों को लाँघ छोड़ आया हूँ
मैं दलदलों को नापतोल आया हूँ
हूँ रास्तों की मुश्किलों से बाखबर
मैं रास्तों को मंजिलों से जोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा
मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
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