सोमवार, 2 दिसंबर 2013

याद





यह किन 
ख्यालों की भट्ठी में 
खुद को जला रहा हूँ 
यह रात यह तन्हाई 
और 
उस बेवफा की याद 
१३-७-२००५

कहाँ तक

ओ मेरी 
महत्वाकांक्षाओं
ओजोन की परतें भी फट चुकीं 
चन्द्र, मंगल, बुध 
सब छूटे पीछे 
सूर्य भी किया पार 
कहाँ  तक ले जाओगी  मुझे 
कहाँ तक.. कहाँ तक.. कहाँ तक  
५.८.२००४

लोकतंत्र

 

नहीं !
कोई जुआ नहीं ! 
तुमनें इनकार किया 

शाबाश !
उन्होनें थपथपाई तुम्हारी पीठ  
यही है क्रान्ति' 

हकूमत के हक में तो
हम भी नहीं 

पर 
तुम्हारे भले के लिए
कुछ तो चाहिए 
(तुम्हें जुतना है 
हमें करनी है सवारी)

ऐसा करो 
तुम चुनो "हमें"
हमारी शर्तों के साथ

और 
बड़ी शान के साथ 
वे लंगड़े लोकतंत्र का 
तांगा चला रहे हैं 

दुश्मन

धीरे धीरे 
दोनों मेरे ... हो गये 
एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में 
एक उड़ान भरने को खुले 
दूसरा हिले भी नहीं 
एक दुसरे को लताड़ते फटकारते 
उन्होनें गवां दी उम्र 
और 
सम्भावनाओं के आकाश को 
देखता ताकता 
मैं जमीन हुआ 

क्या हम जीवित हैं

जिसे भी पूछा 
उसी ने खोली दुखों की पोटली 
जहां भी गया वहीं पाया 
अनजान चौराहा 
हर आँख में 
इक याचक देखा 
हर आत्मा जैसे भिक्षा-पात्र 
कहानिया भूल चुका हूँ 
भूल चुका हूँ गीत प्यार के 
नृत्य भी खो चुका कब का 
क्या मैं जीवित हूँ 
क्या हम जीवित हैं

दिन

क्या  बड़ा  क्या  छोटा  दिन

क्या  आता  क्या  जाता  दिन 
खेल  तमाशा  बच्चों  का  है
ये  बहलाता  फुसलाता  दिन

मेरे बाद

 





नहीं जानता 
क्या होगा 
मेरी कविताओं का हाल 
मेरे बाद 
पर जानता हूँ इतना 
सफेद चींटियों की तरफ 
शब्द नहीं मरते कभी 
न सपने 
न कविता