मैं समुद्र ही हो सकता था
सोमवार, 2 दिसंबर 2013
दुश्मन
धीरे धीरे
दोनों मेरे ... हो गये
एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में
एक उड़ान भरने को खुले
दूसरा हिले भी नहीं
एक दुसरे को लताड़ते फटकारते
उन्होनें गवां दी उम्र
और
सम्भावनाओं के आकाश को
देखता ताकता
मैं जमीन हुआ
क्या हम जीवित हैं
जिसे भी पूछा
उसी ने खोली दुखों की पोटली
जहां भी गया वहीं पाया
अनजान चौराहा
हर आँख में
इक याचक देखा
हर आत्मा जैसे भिक्षा-पात्र
कहानिया भूल चुका हूँ
भूल चुका हूँ गीत प्यार के
नृत्य भी खो चुका कब का
क्या मैं जीवित हूँ
क्या हम जीवित हैं
दिन
क्या बड़ा क्या छोटा दिन
क्या आता क्या जाता दिन
खेल तमाशा बच्चों का है
ये बहलाता फुसलाता दिन
मेरे बाद
नहीं जानता
क्या होगा
मेरी कविताओं का हाल
मेरे बाद
पर जानता हूँ इतना
सफेद चींटियों की तरफ
शब्द नहीं मरते कभी
न सपने
न कविता
कहीं टिकने नहीं देता
कल तक जो मेरी सोच में
दुश्मन की तरह था
आज मेरी सोच का
हमराज हुआ जाता है
यह भी क्या वक्त
कहीं टिकने नहीं देता मुझको
पाँव रखता हूँ कहीं
फिसला कहीं जाता है
तुम्हे फ़ोन करते हुए
तुम्हे फ़ोन करते हुए
एक झिझक सी महसूस होती है
कुछ वैसी जैसे मन में कोई चोर हो
खूब देखा भाला झाडा पोंछा
मन के एक एक कमरे को
एक एक खिड़की दरवाजे को
पर दिखा नहीं
शायद कभी आया हो ठहरा हो
और कुछ न पाकर चला गया हो
मैं लिखना चाहता हूँ इस चोर पर
अपनी सबसे प्यारी कविता
पर उसका कोई स्पर्श रूप रस गंध
कुछ भी तो नहीं मेरे पास
कहीं मैं ही तो नहीं अपना चोर
छतीस
कभी कोई
नन्हा सा प्रश्न
लबरेज़ मासूमियत के साथ
पूछ बैठता है
यह छतीस क्या होते हैं अंकल
थर्टी सिक्स कहते हुए
मेरे होंठ कांप जाते हैं
कैसे कहूँ उससे
यह तुम्हारी
राष्ट्र-भाषा से हुआ
साभिप्राय छल है
कैसे समझाऊँ उसे
यह सारा खेल
यह पढ़ाई
यह ताम-झाम
तुम्हें
छतीस के आँकड़े में
धकेलने की
तैयारी
है
और
जब तुम
समझ पाते हो
तरेसठ
उम्र गुजर चुकी होती है
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