सोमवार, 2 दिसंबर 2013

लौटते हुए

अब जब 
आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द की  
शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ 
वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण 
करती चली गई

ताकि लौट कर 
कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
और 
जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए

ताकि 
प्यार, प्यार हो
न कि बंधन

ईश्वर 
ईश्वर हो
न कि जड़ों तक 
उतरा हुआ डर

स्वतंत्रता 
स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और
 कानून के मछुआरे जाल


ताकि 
जीवन, जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल

हम तो आदमी हैं

जिंदगी जब 
सिद्धांतों और आदर्शों में 
अटक जाती है 


किताबों और उद्धेश्यों में 
भटक  जाती है


 जिंदगी तब ..
जिंदगी नहीं 
गुलामी बन जाती है


गुलामी !  
आप जानते हैं 
पशुओं को भी स्वीकार्य नहीं 
हम तो आदमी हैं

मैं और मेरा समय

मैं और मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी तमाम कमजोरियों के साथ 

मैं और मेरा मेरा समय 
आमने सामने 
अपनी पूरी ताकत के साथ 

मैं और मेरा समय 
क्या कभी दोस्त बन सकते हैं

याद





यह किन 
ख्यालों की भट्ठी में 
खुद को जला रहा हूँ 
यह रात यह तन्हाई 
और 
उस बेवफा की याद 
१३-७-२००५

कहाँ तक

ओ मेरी 
महत्वाकांक्षाओं
ओजोन की परतें भी फट चुकीं 
चन्द्र, मंगल, बुध 
सब छूटे पीछे 
सूर्य भी किया पार 
कहाँ  तक ले जाओगी  मुझे 
कहाँ तक.. कहाँ तक.. कहाँ तक  
५.८.२००४

लोकतंत्र

 

नहीं !
कोई जुआ नहीं ! 
तुमनें इनकार किया 

शाबाश !
उन्होनें थपथपाई तुम्हारी पीठ  
यही है क्रान्ति' 

हकूमत के हक में तो
हम भी नहीं 

पर 
तुम्हारे भले के लिए
कुछ तो चाहिए 
(तुम्हें जुतना है 
हमें करनी है सवारी)

ऐसा करो 
तुम चुनो "हमें"
हमारी शर्तों के साथ

और 
बड़ी शान के साथ 
वे लंगड़े लोकतंत्र का 
तांगा चला रहे हैं 

दुश्मन

धीरे धीरे 
दोनों मेरे ... हो गये 
एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में 
एक उड़ान भरने को खुले 
दूसरा हिले भी नहीं 
एक दुसरे को लताड़ते फटकारते 
उन्होनें गवां दी उम्र 
और 
सम्भावनाओं के आकाश को 
देखता ताकता 
मैं जमीन हुआ