गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मार्तंड कुण्ड

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009


तुझे याद करते हुए
लिखना चाहता हूँ एक अर्थमुक्त कविता
सिर धुनते रहें शब्द पकड़ने वाले
अर्थ उनके हाथ से फिसल फिसल जाएं
मार्तंड कुण्ड की मछलियों की तरह
मैने तो समुद्र खंगाले हैं
मुश्किलन बचा हूँ
शार्कों व्हेलों का निवाला बनने से
फिर मुझे यह मार्तंड कुण्ड
क्यों याद आते हो मार्तंड ! विस्थापन में
तेरा प्रतिनिधि मेरा मित्र कवि
है तो सही मेरे संग यहाँ मेरे पास
तेरे जल में किलोलती मछलियों सी उसकी कवितायें
कहीं भी रहूँ समुद्रों में
पर्वतों पर
आसमानों में
तेरे कुण्ड की मछलियाँ और
उसकी कवितायें मुझे खींच लाती हैं जमीन पर
आज तो बस जी चाहता है
जो जी में आये लिखता चलूँ
कोई पराकाष्ठा छू लूं
यह भी क्या
हर बार लिखते रहें हम
सोची समझी साजिशों सी कवितायेँ!

नदी

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009


नदी मैं जानता हूँ
बूँद बूँद पहाड़ सा दर्द
जब रिसता है
तुम लेती हो जन्म

जानता हूँ
पत्थरों की पछाड़ से
चट्टानों की कोख से
उगाहते हुए
पहाड़ की मिटटी का कुअरापन
कैसे निकलती फलांगती
अल्हड सी गुजरती हो
धरती के घावों पर रखती मरहम

लेकिन नदी
कैसा लगता है
किसी खूंखार मोड़ पर
सभ्यता की कत्लगाहों से
और कत्लगाहों की सभ्यता से
निकले रक्त का
तुझमें आ मिलना !

कैसी लगती है
अपने भीतर मचलती
मछलियों की अपमृत्यु

कैसा लगता है
धरती का पाप गरल धोना
और समुद्र भर रोना

सच कहना नदी ॥ .

हे गणेश जी सबसे पहले आप ही की पूजा क्यों ?

शुक्रवार, 3 सितम्बर 2010


हाँ  बच्चा! सबसे पहले मेरी ही पूजा होनी चाहिए.. क्योंकि, मैं गणित का देवता हूँ  .. गणित का मायना समझते हो बच्चा! ..योजना बनाना  ! किसी भी काम को करने से पहले योजना बना लेना ही मेरी पूजा है, फिर उस काम में सफल होने के अधिक अवसर होते हैं ... देखो मेरा आकार प्रकार हाथी जैसा, लेकिन, वाहन चूहे ! जानते हो क्यों ?
क्योंकि योजना का आकार प्रकार तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन, उसे पूरा करने का काम तो छोटे छोटे लोग ही करते हैं ना! इसीलिए मुझे ॠद्धि सिद्धि का देवता कहा गया है.. और कार्य योजना भी जब बनाओ तो मुदित-मन से बनाना ..यही मेरा मोदक-प्रिय होने का रहस्य है
 .. अच्छा तो इस ब्लॉग के लिए तुमने कोई योजना बनाई है ?
.. अभी तो नहीं देव ..
.. तो चलो सबसे पहले यही काम करो ...कब, क्यों, कैसे, कहाँ.. सारे "क" वाले प्रश्न ले आओ  ..जहां मुश्किल आये तो मुझसे पूछना ..भला !
जैसी आज्ञा  देव...

सृजन (एक अनूदित रचना)

सोमवार, 6 सितम्बर 2010


डॉ के.एल .चौधरी की पुस्तक Enchanting world of infants से एक रचना creation  का हिंदी अनुवाद -- अनुवादक श्यामजुनेजा  



SRIJAN
और 
तब आधी रात
टूटा बांध
छूटा और बह निकला
.प्रसव पूर्व का वह प्रथम संकेत

जैसे रिक्त किया जाना
सतीसर का जल
उस महान  ऋषि के द्वारा
घाटी को जन्म देने से पहले

कैसी थी यह
कुलबुलाती अकुलाहट तुम्हारी
अपने ही बूते चले आने की
मेरे पवित्र गर्भ की
नौ मासी कारा से बाहर

एक अभिनव यात्रा का प्रारंभ
कि कवच ही छेद डाला
अपने लघु कोमल
पादांगुष्ठ नख से
भेद डाले
सुरक्षा के जल घेरे
जो रचे थे मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे आसपास. ..

या की था यह
मेरे गर्भ का अश्रुसिक्त भाव
कि अब
अलग होने का समय आ गया है
जैसा की होता है सबके साथ

कोमल थे
प्रथम पीडा के स्पंदन
मधुर विश्रांत अंतरालों के साथ
और फिर
शक्तिमान तरंगों का नृत्य
वर्चस्व की होड़
जैसे अशांत समुद्र में लहरें

हर लहर
पहली से उतप्त उदग्र प्रचंड
किनारे से टकराने को व्याकुल

दर्द बडा और
तुम्हे धकेलते हुए बढ़ता गया
यह मेरे भीतर
तुम्हारी यात्रा के
अंतिम पडाव में एक प्रयास था
तुम्हारी सहायता के लिए
ताकि मैं तुम्हें बाँहों में भर सकूं

क्या हम दोनों ही थे
इतने उतावले  अधीर
होने को एक दुसरे के सन्मुख
अपनी अपनी देह रचना के साथ
कि सिर के बल
तुम्हारी इस यात्रा में
पहले माथा दिखा.. न की शिरोप्रिष्ठ
और गर्भ द्वार पर अटक गया 

आह
सृजन सरल नहीं होता
न ही
नकुछ से छलकता है कोई आनंद
इच्छाएं
तप के बिना सफल नहीं होतीं
समुद्र मंथन में ही तो फलता है
अमृत  और विष

यह अग्नि परीक्षा का पल
आन पंहुचा था एक साथ
हम दोनों के लिए
मुझे ले जाया गया था प्रसूतिकक्ष में
ताकि शल्य द्वारा
तुम लाये जा सको बाहर
और इस प्रकार
तुम्हारा जन्म हुआ
जैसे किसी महाविस्फोट के बाद
जन्म लेती है सृष्टि

वह रक्त और स्वेद
और आंसू और पीडा के प्रवाह में
प्रकटा ज्योतिपुंज
जैसे किसी अनादिता को पार कर
मैंने सुनी तुम्हारी चीख
जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी
न जाने कब से
और मैंने मींच ली आँखें
एक परमानन्द में

अब मुझे
टाँके लगाये जा रहे  थे 
प्रस्तुति श्याम जुनेजा 

मुझ सा उदास कोई हो दुनिया में


मुझ सा उदास
कोई हो दुनिया में
उस तक पहुंचे मेरी बात
आज कल परसों तरसों 
जैसे भी ..जब भी ..

हालाँकि 
उदासी और प्रतीक्षा में
अजीब सा गहरा रिश्ता है
पर वह मुझसे संपर्क जरूर करे

चिट्ठी से फ़ोन से ईमेल से जैसे भी..

और कुछ न हो तो
सिर्फ दिल से ही याद कर ले
कि दुनिया में कोई और भी है
उसके जितना ही उदास


कि उदास लोगों की भी अब 
होनी चाहिए एक युनियन


कि उदास लोगों को 
झूठी हंसी के मुखोटे
उतार देने चाहिए अब...

उदासी को लगने देनी चाहिए
थोड़ी सी हवा.. थोड़ी धूप !



हिंदी दिवस

मंगलवार, 7 सितम्बर 2010


पूछा कमाल पाशा नें
लगेगा कितना समय
जो बनाना हो तुर्की को राष्ट्र-भाषा
"दस बरस कम से कम"
कहा विशेषज्ञों ने
"तो समझ लो !
बीत चुके यह दस बरस -
तुर्की इस देश की राष्ट्र-भाषा है
ठीक इसी पल से ..."


पर अफ़सोस ! ओ हिंदी !
बीते इतने बरस
न मिला तुम्हें कोई कमाल पाशा ..!


शायद हम दौड़ते रहे सिर के बल
पैरों से सोचते रहे
और बनी रही तू
चिर-उपेक्षित परित्यक्ता सी
अपने ही देश में


ओ हिंदी ! मेरी मातृ-भाषा
आखिर क्या है खोट तुझमें
कि हम मनाते हैं हिंदी दिवस
जैसे पितृ-पक्ष में कोई श्राद्ध !!    श्याम जुनेजा

वह एक पल

मंगलवार, 28 सितम्बर 2010



वह एक पल
जब उस कलाकार ने तुम्हें 
कैमरे में उतारा होगा 
कितना कुछ तय कर गया 
मेरी मंजिलों-मुकाम का रुतबा 
तुमसे मेरा रिश्ता 
मेरी महबूब 

अखबार में छपी 
तेरी तस्वीर 
मैं तो देखूँगा तेरी तस्वीर 
और शब्दों को 
करने दूंगा अपना काम 
जिन्हें मैंने 
जन्मों से पाल रखा है 
मधु-मक्खियों और 
तितलियों की तरह 

कितनी मूंगफलियों का 
लिफाफा बनी होगी 
तेरी तस्वीर 
यह जो 
मेरे हिस्से में चली आयी है 
बनाएगी कितने लिफाफे 
मेरे दिल के 

ओ मरीचिका !