सोमवार, दिसम्बर 28, 2009
एक
हर कोई
स्वयं को खास ही समझता है
फिर वह आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं
दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों के हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना
चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से अ निकल कर
सत्य से जुड़ गया है
पांच
दुनिया का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण
छ
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए