गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

एक छोटे से कवि की छोटी छोटी बातें

सोमवार, दिसम्बर 28, 2009


एक
हर  कोई
स्वयं  को  खास  ही समझता है
फिर वह  आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं

दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के

तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों  के   हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना

चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से  अ  निकल कर
सत्य से जुड़ गया है

पांच 
दुनिया  का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण  

छ 
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए

जिनका कोई शीर्षक नहीं होता

मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009


जिनका  कोई  शीर्षक  नहीं  होता
मैं  ऐसी   ही  भटकी  हुई  कविताओं  का  कवि  हूँ

मेरी  कविताओं  की  वेश  भूषा
जिक्र  मत  करो  
उनके  बालों  को
कंघी  भी  नसीब  नहीं  होती
वह  तो  बस  तडके  उठती  हैं
कुछ  बचा  खुचा  मिला  खा  लेती  हैं
अक्सर  भूखी  ही
निकल  पड़ती  हैं  काम  पर

काम  उनका  क्या
खाली  बोरों  में  इधर  उधर  की  खबरें
कुछ  फेंके  गये  प्लास्टिक  शब्द

उनके  हाथ  में  एक  छड  भी  होती  है
जिसके  सिरे  पर
मिकनातीस  का  टुकड़ा   लगा  रहता  है
रास्ते  के  कील  कांटे
साफ  करती  हैं  मेरी  कविताएँ

मेरी  कविताएँ  स्कूल  नहीं  जातीं
बक्सा  वैनों   में  बैठ  कर
उन्हें  फुर्सत  ही  नहीं  मिलती
इतना काम  है  उनके  पास

सिर   पर  उठाये आसमान
व्यर्थ  से  अर्थ   छानती   हैं  मेरी   कविताएँ..

सिलवटें

बुधवार, दिसम्बर 30, 2009


सिलवटें
यों मेरे पैराहन में न देख
मैं समुद्र सा
बड़ी दूर तक फैला हूँ दोस्त!

पथ भुजंग

रविवार, जनवरी 03, 2010


पथ भुजंग
पाथेय विष
कैसे आऊँ तुम तक
अमा निशा गिरि  उतंग
पथ भुजंग!

इससे पहले कि


इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में

इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें

इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे

उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद

साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल

कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो  लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व

इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं

ईश्वर

बृहस्पतिवार, जनवरी 07, 2010


जिन्होनें कहा
ईश्वर प्रकाश  है
उन्होनें यह न कहा
कितने गहन अंधेरों से भिड कर
उपजा यह प्रकाश

उन्होनें यह न कहा
न होने के विरोध में
होने की यात्रा है ईश्वर

उन्होनें यह भी  न कहा
ईश्वर अथक  प्रयोगधर्मिता  है
और हर ठहराव
ईश्वर के खिलाफ जाता है

मैं एक साथ


मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ