सोमवार, 29 सितंबर 2014

तुलती है हरेक चीज़

तुलती है हरेक चीज़ दुनिया की तुला में
महबूब बसा दिल में मगर तोला नहीं जाता
गुणगान तेरा अक्सर किया करते हैं शबनम
सच यह है कि सच हमसे मगर बोला नहीं जाता

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

फासले

मछली जल में जन्म लेती है
जल से बाहर मर जाती है
आदमी झूठ में जन्म लेता है
झूठ से बाहर मर जाता है

पर कविता
सच में जन्मती है
सच के लिए धडकती है

शायद इसीलिए
आदमी और कविता  में
फासले.. और फासले..
और और फासले बचे रहते हैं !

उमस

बुधवार, अक्तूबर 21, 2009

(रचनाकार महाराज कृष्ण सन्तोषी)

महाशय
आप पूछ सकते हैं
जब उमस हो
तो तैमूर को
याद करने में क्या तुक


पहाड़ बर्फ नदियाँ
स्मृतियों में इनका आना
स्वाभाविक है
पर उमस में जाग जाना
इतिहास बोध
सचमुच हैरान कर देने वाला है


महाशय आप और कुछ न पूछें
सिर्फ़ सुनें

दरअसल
हमारे यहाँ जब बच्चों को
daant पड़ती थी
तो बुजुर्ग उनसे यह कहते थे
जा तुझे देखने पड़ें
उमस भरे दिन

इस daant में
हमारे इतिहास का वह दस्तावेज़ है
जो हमारी ही सांसों में
खुलता बंद होता है


महाशय
आप विश्वास करें न करें
पर जब उमस badti है
समय बैचैनी से कटने लगता है
हमें अपना इतिहास याद आता है

सात सौ साल पहले
तैमूर के डर से
भाग आए थे
हमारी धरती पर सात सौ घुड़सवार
और उन डरे हुए
सात सौ घुड़सवारों के डर से
सात लाख इंसानी शक्लें
कब से भटकती फ़िर रही हैं
यहाँ वहां
पसीने स लथपथ


महाशय
आप जिसे उमस कहते हैं
हमारे लिए उसका सम्बन्ध
समंदर से नहीं
तैमूर के आतंक से है ... 

मैं समुद्र ही हो सकता था

बृहस्पतिवार, अक्तूबर 22, 2009


मैं समुद्र ही हो सकता था
कि प्रत्येक धारा ने
मुझ ही में समाना है
मुझ ही से पाना है
अपने प्रवाह का बल

अपार है मेरी कड़वाहटों का विस्तार
पर अथाह है मेरी प्रतिबद्दता

आओ तमतमाई हुई झुलसी हवाओं
मुझ से लो जितनी चाहो उतनी नमी

शिखरों को विशुद्द सत्व से
धवल करो
तराई मैदानों में भरो इन्द्रधनुषी रंग

अरे मेरी चिंता न करो
मेरा गौरव मेरी व्यथाओं में सुरक्षित है.

वक्त

रविवार, दिसम्बर 27, 2009


वक्त
जेब कतरा वक्त
न जाने 
कब से लगा था पीछे
और अचानक . .
 सब खो गया

किस थाने .. 
करूं शिकायत 
अपनी ही बेख्याली का
आता है रोना

क्यों चला आया
चेहरों पर चढ़े चेहरे
इस शहर को देखने
रखा ही क्या था यहाँ

हर आस नकली
 हर सपना झूठा

वक्त जेबकतरा 
हाकिम इस शहर का..

बर्फ


बर्फ  जो  हर  साल
किसी दोस्त  सी उतरती थी
कहवों और कह्कहों  के बीच
इक शाने बे नियाजी के साथ
सेबों को बाँटती लालिमा
धान को जीवन के गीत
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी

जैसे आडिट की कोई
मुहीम चली थी आसमानों  में

जैसे पूछ रही थी
मेरी इस घाटी को रक्तरंजित करने का
मेरे ही बन्दों को बेघर
दरबदर करने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया था

बर्फ जो गिरी थी इस बार
जैसे पहाड़ों के पास अपने
दाग धोने के लिए भी  बचा नहीं  था पानी

बर्फ जो हर बार
किसी दोस्त सी उतरती थी
इक शाने बे नियाजी के साथ
इस बार गिरी थी किसी लेनदार  सी

सन्दर्भ :- कश्मीर से विस्थापन के बाद किसी एक साल बर्फ ने अपना तांडव दिखाया  था  कश्मीर में

एक छोटे से कवि की छोटी छोटी बातें

सोमवार, दिसम्बर 28, 2009


एक
हर  कोई
स्वयं  को  खास  ही समझता है
फिर वह  आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं

दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के

तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों  के   हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना

चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से  अ  निकल कर
सत्य से जुड़ गया है

पांच 
दुनिया  का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण  

छ 
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए