सोमवार, 2 दिसंबर 2013

विरसे में




विरसे में बस एक किताब
दशकों फैली 
मृगतृष्णा सी एक किताब 

बच पाएगा 
कब तक इसका सच 
जिल्दे पर तो
पंजा मारे बैठे है 
केतु के धड 
राहू के सिर
"सत्यमेव जयते पर"

विरसे में बस यही  किताब
दशकों फैली 
मरू-भूमि सी... यही किताब

बचपन



छुटपन में पतंगें उड़ाने का गजब शौक था
आज बूढों बूढों को कम्पनियां उड़ाते देखता हूँ
और मुझे बचपन याद आ जाता है

इबादत




निगाहें  चुराने में क्या रक्खा   है
नजरें मिलाना कुछ और बात है
बातें बनाना सभी को आता है 
करके दिखाना कुछ और बात है 

कुफ्र हर हाल में 
जनूं-ए-जिहाद-ओ-नादानियां 
नगमा-ए-नूर-ओ-जीस्त सुन पाना 
कुछ और बात है 

नमाज-ओ-दुआ भी 
बे-मकसद नहीं श्याम 
इबादत का उतर आना कुछ और बात है

गुमशुदा बुढिया


सुना है 
कभी चाँद पर 
रहा करती थी एक बुढिया 
चरखा कातने वाली बुढिया
चरखे पर काता करती थी 
पृथ्वी के बच्चों के लिए 
रंग-बिरंगी चमकती चटकती   
चटपटी कहानियाँ 
जिनमें डरे हुए खरगोशों की 
बहादुरी के किस्से हुआ करते थे 
मूर्खाधिराज शेर ..
दुम तान कर भागते 
हिरणियों के छौने  
सुस्त-रफ्तार जीतने वाले कछुए 
और भी पता नहीं क्या कुछ ..

और अचानक वह बुढिया 
चाँद से गायब हो गई 
(कर दी गई / अगवा हो गई 
किसीको नहीं मालूम) 

हमने भेजा चाँद पर 
नील-आर्म-स्ट्रांग
और उसके पीछे 
और भी कितनों को 
उस बुढिया की तलाश में 
पर वह होती वहाँ तो मिलती

 सिरमुई 
 पता नहीं कहाँ जा छिपी है 

उड़ती खबर यह है 
किसी हे खता काफूर  के नाम से 
वह बुढिया 
पृथ्वी के इस 
सबसे गुंजान इलाके में 
कोई जाल बिछा रही है 
गरीब, अनपढ़ जाहिल गंवार 
 हिंदुस्तानियों को 
चन्द्रिले सपने दिखा कर  
नावा बना रही है 

खबर पक्की हो 
तो खबर करना 


मैं

दुनिया तेरी और
रूह का फंदा यह जिस्म
कुछ भी नहीं कि
जिसको कहूँ कि मैं !
 
तू तेरा
दिल तेरा
गम तेरा
कुछ तो हो कि
जिसको कहूँ  कि मैं

भेड़


मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़
मिमियाते रहते हैं दिन रात..
भेड़ होभीड़ में जीना सीखो..
देखने..
‘कुछ और होने’ के ख़्वाब...
पाप है..
गुनाह है..
कुफ्र-ओ-बगावत है

भीड़ से कट के चलोगे..कट जाओगे
भीड़ से हट के चलोगे...बंट जाओगे

नहीं जानते बेचारे
भीड़ या भीड़ से बचकर..
कटना उनकी नियति है...

मेरे भीतर
ये किस्म-किस्म के भेड़

कितनी मालदार आसामी हूँ मैं

कुछ तो है..

कुछ तो है..
      मौसम ! 
तनहाई के साज पर
कोहरे का राग क्यों
बाहर जो फाग है..
भीतर की आग क्यों
आखिर
यह क्या सांठ-गाँठ है
कुछ तो कहती जा
ऐऽऽ रीऽऽ कविता
...ओऽऽ मौसम !
शर्मा गएऽऽ... क्या ?