सोमवार, 2 दिसंबर 2013

कामन वेल्थ

1.
जुबाँ की आँख नहीं 
आँख बे-जुबाँ मेरी 
कहूँ  तो किससे कहूँ 
क्या है दास्ताँ मेरी 
फलक ने खोल दिए राज़ सब 
जो पिन्हा थे 
कामन वेल्थ खेल 
और यह जाँ मेरी
 --श्याम 

2.
दांत बेचारे क्या करें 
कुछ फौजी हैं  कुछ गुन्डे हैं 
चबाते हैं 
हुकम बजा लाते हैं 

खतरनाक तो है  जुबाँ 
स्वादों की मारी 
दुखियारी 
सिर्फ हुक्म चलाती है 

दिल्ली को   
कामन वेल्थ 
बना  जाती  है


शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010

(:हँडल विद केयर:)

न उसे देखा था कभी
न सुना कभी
न कुछ लेना था उससे
न कुछ देना था उसे  

फिर भी उसकी याद
जैसे
गर्म दोजख दिनों में
बरसात की फुहार सी   
चूम गई है मुझे
अभी के अभी

यूं ही बैठे-ठाले 
सोचने लगा हूँ  
आखिर क्या हुआ था ऐसा  
हमारे बीच  
जो वह शोख कली यूं रूठ गई
पलट कर पूछा तक नहीं  
मरीजों का हाल  

जरूरी है
बहुत जरूरी है
कुछ चीज़ों कुछ रिश्तों पर
लिखा रहना
(:हँडल विद केयर:)

शायद यह देश ...


निकाल कर जंजीरों से

टांग दिया सलीब पर
अब किसी हथौड़े की चोट
किसी कील की चुभन
कोई असर नहीं करते

शायद यह देश ...

यह मेरा देश ..


मेरी आँखों में तो अब
पानी भी नहीं है ...

घुटन

मैं यूं ही 
कविता के पीछे 
क्यों पड़ा रहता हूँ 
क्या लेना-देना है 
मेरा कविता से 
न यह मेरे 
किसी बिल को 
भरने के काम आती है 
न किसी दफ्तर में कुर्सी दिलाती है 
बस 
 घोटती रहती है 
मेरी घुटन की भांग 
बारीक और बारीक 
कि
एक-एक परमाणु 
चिन्चियाने लगता है 
मुझे तो 
यह भी नहीं मालूम 
इतनी पिसी हुई
 घुटन को कहाँ फेंकू 
कैसे बचूं और बचाऊँ जग को 
इसके विकरण से 
 

अपने उड़न- तश्तरी साहब के नाम :)

एक लग्ज़री 
चार तश्तरी !

छापू किधर है !

पंखा चलाओ !

अरे !
बाहर, मेरी साइकल खड़ी है 
ख्याल रखना ! 

दरअसल

वह किसी से प्यार नहीं करता
कैसे 
कर सकता है 
किसी से प्यार 
खुद से नाराज आदमी 
वह तो बस
अपनी नाराजगी को 
भुनाने के सबब 
प्यार का ढोंग करता है 
इससे भी उससे भी 
सबसे 
इस आदमी का ऐतबार न करना 

खेल

मैं
परमाणु को देखूं

या
प्रकाशाब्धियों-पूर्व
शुद्ध ऊर्जा में हुए उस 
महा-महा-विस्फोट को देखूं

या
इन छोरों में कहीं टंगे से 
अपने इस
अस्तित्व-हीन
अस्तित्व को देखूं ..

या
अपने ही ज्ञान में बंधे
परम अज्ञान को देखूं ..

परम बोध की
अबोधता में लौट चलूँ ..
या
गति में
अगति का नियंत्रण देखूं ..

आखिर
हुआ क्या है मुझे

खुद से खुद की
छुपा-छुपाई का
यह क्या खेल
खेलता रहता हूँ ?