गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

सृजन (एक अनूदित रचना)

सोमवार, 6 सितम्बर 2010


डॉ के.एल .चौधरी की पुस्तक Enchanting world of infants से एक रचना creation  का हिंदी अनुवाद -- अनुवादक श्यामजुनेजा  



SRIJAN
और 
तब आधी रात
टूटा बांध
छूटा और बह निकला
.प्रसव पूर्व का वह प्रथम संकेत

जैसे रिक्त किया जाना
सतीसर का जल
उस महान  ऋषि के द्वारा
घाटी को जन्म देने से पहले

कैसी थी यह
कुलबुलाती अकुलाहट तुम्हारी
अपने ही बूते चले आने की
मेरे पवित्र गर्भ की
नौ मासी कारा से बाहर

एक अभिनव यात्रा का प्रारंभ
कि कवच ही छेद डाला
अपने लघु कोमल
पादांगुष्ठ नख से
भेद डाले
सुरक्षा के जल घेरे
जो रचे थे मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे आसपास. ..

या की था यह
मेरे गर्भ का अश्रुसिक्त भाव
कि अब
अलग होने का समय आ गया है
जैसा की होता है सबके साथ

कोमल थे
प्रथम पीडा के स्पंदन
मधुर विश्रांत अंतरालों के साथ
और फिर
शक्तिमान तरंगों का नृत्य
वर्चस्व की होड़
जैसे अशांत समुद्र में लहरें

हर लहर
पहली से उतप्त उदग्र प्रचंड
किनारे से टकराने को व्याकुल

दर्द बडा और
तुम्हे धकेलते हुए बढ़ता गया
यह मेरे भीतर
तुम्हारी यात्रा के
अंतिम पडाव में एक प्रयास था
तुम्हारी सहायता के लिए
ताकि मैं तुम्हें बाँहों में भर सकूं

क्या हम दोनों ही थे
इतने उतावले  अधीर
होने को एक दुसरे के सन्मुख
अपनी अपनी देह रचना के साथ
कि सिर के बल
तुम्हारी इस यात्रा में
पहले माथा दिखा.. न की शिरोप्रिष्ठ
और गर्भ द्वार पर अटक गया 

आह
सृजन सरल नहीं होता
न ही
नकुछ से छलकता है कोई आनंद
इच्छाएं
तप के बिना सफल नहीं होतीं
समुद्र मंथन में ही तो फलता है
अमृत  और विष

यह अग्नि परीक्षा का पल
आन पंहुचा था एक साथ
हम दोनों के लिए
मुझे ले जाया गया था प्रसूतिकक्ष में
ताकि शल्य द्वारा
तुम लाये जा सको बाहर
और इस प्रकार
तुम्हारा जन्म हुआ
जैसे किसी महाविस्फोट के बाद
जन्म लेती है सृष्टि

वह रक्त और स्वेद
और आंसू और पीडा के प्रवाह में
प्रकटा ज्योतिपुंज
जैसे किसी अनादिता को पार कर
मैंने सुनी तुम्हारी चीख
जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी
न जाने कब से
और मैंने मींच ली आँखें
एक परमानन्द में

अब मुझे
टाँके लगाये जा रहे  थे 
प्रस्तुति श्याम जुनेजा 

मुझ सा उदास कोई हो दुनिया में


मुझ सा उदास
कोई हो दुनिया में
उस तक पहुंचे मेरी बात
आज कल परसों तरसों 
जैसे भी ..जब भी ..

हालाँकि 
उदासी और प्रतीक्षा में
अजीब सा गहरा रिश्ता है
पर वह मुझसे संपर्क जरूर करे

चिट्ठी से फ़ोन से ईमेल से जैसे भी..

और कुछ न हो तो
सिर्फ दिल से ही याद कर ले
कि दुनिया में कोई और भी है
उसके जितना ही उदास


कि उदास लोगों की भी अब 
होनी चाहिए एक युनियन


कि उदास लोगों को 
झूठी हंसी के मुखोटे
उतार देने चाहिए अब...

उदासी को लगने देनी चाहिए
थोड़ी सी हवा.. थोड़ी धूप !



हिंदी दिवस

मंगलवार, 7 सितम्बर 2010


पूछा कमाल पाशा नें
लगेगा कितना समय
जो बनाना हो तुर्की को राष्ट्र-भाषा
"दस बरस कम से कम"
कहा विशेषज्ञों ने
"तो समझ लो !
बीत चुके यह दस बरस -
तुर्की इस देश की राष्ट्र-भाषा है
ठीक इसी पल से ..."


पर अफ़सोस ! ओ हिंदी !
बीते इतने बरस
न मिला तुम्हें कोई कमाल पाशा ..!


शायद हम दौड़ते रहे सिर के बल
पैरों से सोचते रहे
और बनी रही तू
चिर-उपेक्षित परित्यक्ता सी
अपने ही देश में


ओ हिंदी ! मेरी मातृ-भाषा
आखिर क्या है खोट तुझमें
कि हम मनाते हैं हिंदी दिवस
जैसे पितृ-पक्ष में कोई श्राद्ध !!    श्याम जुनेजा

वह एक पल

मंगलवार, 28 सितम्बर 2010



वह एक पल
जब उस कलाकार ने तुम्हें 
कैमरे में उतारा होगा 
कितना कुछ तय कर गया 
मेरी मंजिलों-मुकाम का रुतबा 
तुमसे मेरा रिश्ता 
मेरी महबूब 

अखबार में छपी 
तेरी तस्वीर 
मैं तो देखूँगा तेरी तस्वीर 
और शब्दों को 
करने दूंगा अपना काम 
जिन्हें मैंने 
जन्मों से पाल रखा है 
मधु-मक्खियों और 
तितलियों की तरह 

कितनी मूंगफलियों का 
लिफाफा बनी होगी 
तेरी तस्वीर 
यह जो 
मेरे हिस्से में चली आयी है 
बनाएगी कितने लिफाफे 
मेरे दिल के 

ओ मरीचिका !

तुम्हें पुकारते हुए

बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010



तुम्हें पुकारते हुए 
जिनसे होती है मुलाक़ात 
वे मेरे दिल की तहों में छिपे राज़ हैं!

 या
 भीगने को बेताब मौसम में 
अबाबीलों के बच्चों की उड़ान! 

या
 दूर  किसी पहाड़ में बसे 
गाँव के लोगों के भोले डर 
जो शहरी उजालों से डरतें हैं !

तुम्हें करते हुए याद

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010


तुम्हें करते हुए याद 
मुझे लगता है डर
तेरी नींद में जाकर 
मेरी याद 
कोई बवाल न कर दे 

तुम कहीं भटक न जाओ 
किसी सपने के बेतरतीब 
डरावने 
और खूबसूरत जंगल में 

हमारे  बीच की यह दूरी 
किसी और यात्रा का 
रुख न कर ले 

डरता हूँ 
तुम्हें करते हुए याद

इश्क

मंगलवार, 2 नवम्बर 2010


मजाजी हो हकीकी हो 
इश्क तो इश्क है 
वे जो चिढते हैं इश्क से 
अगर देख पाते 
यह करिश्मा ..यह कायनात ..
यह सारे का सारा वजूद 
है किसी के इश्क का नजारा 
पर 
उन्होंने तो बाँध रक्खी हैं
आँखों पर पट्टियाँ  
हवा में भांजते फिरते हैं लाठियां 
शायद 
ये उनका शौक हो या पेशा 
हुआ करे 
मुझे क्या एतराज 
वे खंदके खोदें 
खाईयों को और चौड़ा करें 
झूठ और नफरत की आग में 
सडें लडें मरें 

मैं उन्हें रोकूँगा नहीं 
बस 
तौहीने इश्क न करें 
इस कुफ्र की 
कहीं कोई तौबा नहीं 

श्याम जुनेजा