गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
बर्फ
किसी दोस्त सी उतरती थी
कहवों और कह्कहों के बीच
इक शाने बे नियाजी के साथ
सेबों को बाँटती लालिमा
धान को जीवन के गीत
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी
जैसे आडिट की कोई
मुहीम चली थी आसमानों में
जैसे पूछ रही थी
मेरी इस घाटी को रक्तरंजित करने का
मेरे ही बन्दों को बेघर
दरबदर करने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया था
बर्फ जो गिरी थी इस बार
जैसे पहाड़ों के पास अपने
दाग धोने के लिए भी बचा नहीं था पानी
बर्फ जो हर बार
किसी दोस्त सी उतरती थी
इक शाने बे नियाजी के साथ
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी
सन्दर्भ :- कश्मीर से विस्थापन के बाद किसी एक साल बर्फ ने अपना तांडव दिखाया था कश्मीर में
एक छोटे से कवि की छोटी छोटी बातें
सोमवार, दिसम्बर 28, 2009
एक
हर कोई
स्वयं को खास ही समझता है
फिर वह आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं
दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों के हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना
चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से अ निकल कर
सत्य से जुड़ गया है
पांच
दुनिया का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण
छ
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए जिनका कोई शीर्षक नहीं होता
मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009
मैं ऐसी ही भटकी हुई कविताओं का कवि हूँ
मेरी कविताओं की वेश भूषा
जिक्र मत करो
उनके बालों को
कंघी भी नसीब नहीं होती
वह तो बस तडके उठती हैं
कुछ बचा खुचा मिला खा लेती हैं
अक्सर भूखी ही
निकल पड़ती हैं काम पर
काम उनका क्या
खाली बोरों में इधर उधर की खबरें
कुछ फेंके गये प्लास्टिक शब्द
उनके हाथ में एक छड भी होती है
जिसके सिरे पर
मिकनातीस का टुकड़ा लगा रहता है
रास्ते के कील कांटे
साफ करती हैं मेरी कविताएँ
मेरी कविताएँ स्कूल नहीं जातीं
बक्सा वैनों में बैठ कर
उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती
इतना काम है उनके पास
सिर पर उठाये आसमान
व्यर्थ से अर्थ छानती हैं मेरी कविताएँ..
इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर
इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में
इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें
इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे
उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद
साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल
कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व
इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर
यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं
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