सोमवार, 2 दिसंबर 2013

दरअसल

वह किसी से प्यार नहीं करता
कैसे 
कर सकता है 
किसी से प्यार 
खुद से नाराज आदमी 
वह तो बस
अपनी नाराजगी को 
भुनाने के सबब 
प्यार का ढोंग करता है 
इससे भी उससे भी 
सबसे 
इस आदमी का ऐतबार न करना 

खेल

मैं
परमाणु को देखूं

या
प्रकाशाब्धियों-पूर्व
शुद्ध ऊर्जा में हुए उस 
महा-महा-विस्फोट को देखूं

या
इन छोरों में कहीं टंगे से 
अपने इस
अस्तित्व-हीन
अस्तित्व को देखूं ..

या
अपने ही ज्ञान में बंधे
परम अज्ञान को देखूं ..

परम बोध की
अबोधता में लौट चलूँ ..
या
गति में
अगति का नियंत्रण देखूं ..

आखिर
हुआ क्या है मुझे

खुद से खुद की
छुपा-छुपाई का
यह क्या खेल
खेलता रहता हूँ ?

सत्ता

१.
वह जो बैठा 
सत्ता की ऊंची अटारी
देखता तमाशा
कैसे बेबस वानरसेना
बनाती है कागज के पुतले 
ऊंचे से ऊंचे
बुराई पर
अच्छाई की जीत का 
जश्न मनाती है
सहस्त्रग्रीवी रावण के ठहाके 
पटाखों में गूँज उठते हैं
हमें लगता है
रावण जल रहा है...
२.
रावण
नहीं जलता कभी
उसकी नाभि में है
सत्ता-अभिमंत्रित
अमृत-कुण्ड
“मैं और 
मेरा-परिवार”का
दुर्दम्य अहंकार
शोषण.. षड्यंत्र 
३.
सत्तासीन होने के बाद
खुला राम के समक्ष
सत्ता का रहस्य
पर हो चुकी थी देर
(कीमत जानकी को
चुकानी पड़ी)
आता रहा उन्हें याद
वह उन्मुक्त वन-जीवन
प्रकृति का परिवेश
सब के सब दरवेश
नित्य नयी चुनौतियां
तरो-ताज़े समाधान
और कहाँ यह 
सिंहासनी 
नैतिकता 
नियम-धर्म-पाखण्ड
सिद्धांतों, आदर्शों में लिपटे  
नकली, खोखले बंधन
तभी तो लिया 
कृष्णावतार
किया चीरहरण.. दिया वस्त्र-दान
पर सभ्यता के पाखंड को 
कौन कैसे बाँचे अनकही 
गीता-रामायण !

कंचनजंघा


परमात्मन्
जो कुछ भी लिखूं
तुझे साक्षी मान कर लिखूं
सच या झूठ.. जो भी

कहीं लिखी थी इसी कलम ने
एक पंक्ति
सच कहना कंचनजंघा लांघना है
क्या बिना प्रेम का भी होता है
कोई सच या कंचनजंघा ?

जिस किसी ने भी
दिया होगा,
पर्वतशिखर को यह नाम
कैसा गजब का अजीब सा
 आशिक होगा
अपने समय का

 मेरा भूगोल कमजोर है ..
नहीं मालूम
पृथ्वी की नाभि में खिली
प्रस्तर कमल श्रृंखला सी  
इस पर्वतमाला में
कौन है कहाँ है ..कंचनजंघा 

(पर इतना पता है
इस नाम का भी
एक पर्वत-शिखर है) .
(यह गूगल सर्च देवता किस दिन काम आएगा)
तो यह रहा  
कंचनजंघा शिखर
विश्व में तीसरी सबसे ऊँची ..
सोने की जांघ

वाह रे शिव!
अपनी पारो की ऐसी तारीफ़ तो
किसी देवदास ने भी नहीं की
पर मैं यह सब
क्या लिख रहा हूँ  

ओह!
यह तो जैसे हर दिन
लिख जाता हैं रश्मि-रथी 
 झिलमिलाते हिम-रजत-पत्र पर  
अपना स्वर्णिम प्रेम-पुराण 
सांझ लौटते
नहीं भूलता बटोरना
संदेस प्रियतमा पृथ्वी का 
पर, मैं यह सब
क्यों लिख रहा हूँ?

पर्वत
दूर से ही
भले नजर आते हैं
या फिर होते हैं
शिव-तुल्य
दुस्साहसियों के लिए

मुझसा
कमजोर दिल दिमाग आदमी
क्या करे पर्वतों की बात
क्या गाये पृथ्वी-सूर्य
के प्रेम गीत
(इस असामाजिक सामाजिकता से
फुर्सत मिले..
तब ना !)

भई तू तो
दूर से ही कर ले नमस्कार
यह काम तो किसी भवभूति
किसी कालिदास के लिए छोड़ दे

विरसे में




विरसे में बस एक किताब
दशकों फैली 
मृगतृष्णा सी एक किताब 

बच पाएगा 
कब तक इसका सच 
जिल्दे पर तो
पंजा मारे बैठे है 
केतु के धड 
राहू के सिर
"सत्यमेव जयते पर"

विरसे में बस यही  किताब
दशकों फैली 
मरू-भूमि सी... यही किताब

बचपन



छुटपन में पतंगें उड़ाने का गजब शौक था
आज बूढों बूढों को कम्पनियां उड़ाते देखता हूँ
और मुझे बचपन याद आ जाता है

इबादत




निगाहें  चुराने में क्या रक्खा   है
नजरें मिलाना कुछ और बात है
बातें बनाना सभी को आता है 
करके दिखाना कुछ और बात है 

कुफ्र हर हाल में 
जनूं-ए-जिहाद-ओ-नादानियां 
नगमा-ए-नूर-ओ-जीस्त सुन पाना 
कुछ और बात है 

नमाज-ओ-दुआ भी 
बे-मकसद नहीं श्याम 
इबादत का उतर आना कुछ और बात है