सोमवार, 2 दिसंबर 2013

छतीस

कभी कोई 
नन्हा सा प्रश्न 
लबरेज़ मासूमियत के साथ 
पूछ बैठता है 
यह छतीस क्या होते हैं अंकल 


थर्टी सिक्स कहते हुए 
मेरे होंठ कांप जाते हैं 

कैसे कहूँ उससे 
यह तुम्हारी राष्ट्र-भाषा से हुआ  
साभिप्राय छल है 

कैसे समझाऊँ उसे 
यह सारा  खेल 
यह पढ़ाई
यह ताम-झाम 
तुम्हें 
छतीस के आँकड़े में 
धकेलने की  
तैयारी है 

और 
जब तुम 
समझ पाते हो तरेसठ 
उम्र गुजर चुकी होती है  


बेकार है

मेरी आँखों में 
जल रही है नींद 
कौंध रहे किरचों से 
कुछ सपने कोरे 

इस धुएं में 
मुझे कुछ नहीं सूझता 


कहाँ हैं 
शब्द... अर्थ ...ध्वनियाँ 
सभी तो जल रहे हैं 

यह तिड़ तिड़  की आवाज़ 
आप भी तो सुन रहे हैं 
फिर भी पूछते हैं 
क्या हुआ ?

पर 
क्या होगी
 आपकी दिलचस्पी 
कुछ शब्द बटोरेंगे 
उन्हें तलेंगे
पकाएंगे 
खायेंगे और भूल जायेंगे 

बेकार है  
 आपसे कुछ कहना 
 

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

 

कवि होना

वाह!
धडाक से कहा दिल ने 

हाँ !
इसे कहते हैं ..कवि होना !

जीवन की इस
 घनीभूत असहजता में से 
सहजता को तलाश लेना 

जटिलतम से 
सरलतम को चीन्ह लेना 

कवि होना 
प्रश्न-चिन्ह होना है 

कवि होना 
जैसे किसी सेल में 
बिजली का होना 

जैसे किसी देह में
 धडकनों का होना है 

(बलदेव वंशी को सुनकर )

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

मेरे ख्वाबों में इक शहर है ऐसा

 

लबों पे  
इश्क के तराने
दिलों  में 
मुहब्बत के अफसाने 
मेरे ख्वाबों में 
इक शहर है ऐसा 
जैसे 
कडकती ठंड में दस्तानें 

 

22 सितम्बर 2010

प्रिय दिव्या के लिए धन्यवाद के साथ

  "दिल में ऐसे उतर गया कोई 
जैसे अपने ही घर गया कोई
आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी 
मुझ से होकर गुजर गया कोई  
इतने खाए थे रात से धोखे 
चाँद निकला कि डर गया कोई"

(उपरोक्त पंक्तियाँ 
सूरजभानु गुप्त के काव्य-संकलन 
"एक हाथ की ताली" से हैं 
उनकी पुस्तक को पढ़ने के बाद 
मेरे उदगार इस प्रकार व्यक्त हुए) ---

"एक हाथ की ताली"
दी खुद को गाली
इत्ती देर से मिली 
यह कविता मतवाली 

मुझे शक है 
शहर की नीयत पर 

नहीं होती 
शहर में संवेदना 
इतनी गहरी 
कि 

हर भाव हर भंगिमा 
चुन ले 
अपने माप के शब्द 
और नाचने लगे

मुझे शक है कि  
यह कविता 
सूरजभान की हैं

नाम 
बेशक है उनका 
पर कविता गाँव की है 

... श्याम 

यह कवि था

कभी जब 
वह सुबह होगी
जिंदगी पुर-लुत्फ़ 
पुर-सकूं होगी
पलट कर एक बार 
कर लेना याद
कवि को भी

यह कवि था
जिसने भाव को ध्वनि दी
ध्वनि को शब्द दिए
शब्द को अलंकृत किया
तुम्हे भाषा दी

कल्पना करो
अपनी बात कहने के लिए
तुम्हारे पास मुहावरा ना होता
गीत न होते,  कविता न होती

तुम आज भी
कच्चे मांस के स्वाद से
आगे नहीं निकल पाते

गम

गम 
ऐसा तेज़ाब होता है 
दिल 
जिस्मों जां तक ही नहीं 
रूह तक का अज़ाब होता है 

गम के मारों के लिए 
पीना सवाब होता है