गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

तुम्हें पुकारते हुए

बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010



तुम्हें पुकारते हुए 
जिनसे होती है मुलाक़ात 
वे मेरे दिल की तहों में छिपे राज़ हैं!

 या
 भीगने को बेताब मौसम में 
अबाबीलों के बच्चों की उड़ान! 

या
 दूर  किसी पहाड़ में बसे 
गाँव के लोगों के भोले डर 
जो शहरी उजालों से डरतें हैं !

तुम्हें करते हुए याद

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010


तुम्हें करते हुए याद 
मुझे लगता है डर
तेरी नींद में जाकर 
मेरी याद 
कोई बवाल न कर दे 

तुम कहीं भटक न जाओ 
किसी सपने के बेतरतीब 
डरावने 
और खूबसूरत जंगल में 

हमारे  बीच की यह दूरी 
किसी और यात्रा का 
रुख न कर ले 

डरता हूँ 
तुम्हें करते हुए याद

इश्क

मंगलवार, 2 नवम्बर 2010


मजाजी हो हकीकी हो 
इश्क तो इश्क है 
वे जो चिढते हैं इश्क से 
अगर देख पाते 
यह करिश्मा ..यह कायनात ..
यह सारे का सारा वजूद 
है किसी के इश्क का नजारा 
पर 
उन्होंने तो बाँध रक्खी हैं
आँखों पर पट्टियाँ  
हवा में भांजते फिरते हैं लाठियां 
शायद 
ये उनका शौक हो या पेशा 
हुआ करे 
मुझे क्या एतराज 
वे खंदके खोदें 
खाईयों को और चौड़ा करें 
झूठ और नफरत की आग में 
सडें लडें मरें 

मैं उन्हें रोकूँगा नहीं 
बस 
तौहीने इश्क न करें 
इस कुफ्र की 
कहीं कोई तौबा नहीं 

श्याम जुनेजा

किताबें

शनिवार, 25 सितम्बर 2010


कोई भी किताब आपको कुछ नहीं देती.. आप जो लेना चाहते हैं ले लेते हैं ... आप क्या लेना चाहते हैं; इस पर निर्भर करता है कि आपको क्या सिखाया गया है .. जब आप  इस सीखे हुए से मुक्त होकर, निष्पक्ष होकर, किताब से कुछ ले पाते हैं.. उतना ही आपका अपना होता है.. इसी के आधार पर आप में किताब-ऐ -जीस्त को पढ़ने की कुव्वत पैदा हो पाती है ... यह समझ लिया जाना चाहिए.. जिंदगी से बड़ी न कोई किताब थी, न है, न होगी ..जिसने जिंदगी की किताब नही पढ़ी, उसमे इबादत  की पात्रता भी विकसित नहीं हो पाती और यदि आपकी जिंदगी में  इबादत नहीं है तो वह मिटटी है..
अगर एक किताब अल्लाह के फरमान से है तो दुनिया की सारी किताबें भी अल्लाह के फरमान से हैं क्योंकि वह एक है और उसी के फरमान से सब होता है ..ये किताबें आपकी मदद के लिए हैं आप पर लादे  जाने   के लिए नहीं हैं 

अदा !

रविवार, 26 सितम्बर 2010


अदा ! हाँ.. यही पेज तो लेना है आज !  आज तो मुझे अपनी इसी दिलरुबा से बात करनी है !..वैसे, जब अखबार से यह तस्वीर उतारी थी, तब यह नहीं सोचा था की इस पर भी कभी कुछ  लिखूंगा ! बस खटक गया था कुछ भीतर.. शायद ! यह मेरी कविता है..!
बायीं हथेली पर धरी ठुड्डी .. मुड़ी हुई उंगलियाँ, बायीं गाल में धंसी हुई ! गिरती हुई बालों की लट, जैसे कश्मीर के रस्ते में नासरी-नाले के पास एक पतली सी जल-धारा.. एक ऊँचाई से गिरती हुई !
प्रसिद्ध फ़िल्मी हस्तियों के चेहरे, मेरे इसी काम तो आते हैं   मेरी इस अनाम गुड़िया-बेबी का चेहरा, जवानी में, फिल्म-अभिनेत्री राखी के मुहांदरे के आस-पास ठहरता है ..
चेहरों में मेरी दिलचस्पी ! आम सी बात है.. हम सब चेहरों में ही तो जीते हैं..जितने चेहरे बाहरी दुनिया में दिखते हैं; उसके दस गुणा तो हमारे भीतर टहलते रहते हैं ! इस चेहरे का तो मुझे नाम भी नहीं मालूम .. पर खास बात .. यह अदा ! कुशल से कुशल निर्देशक और मंझे हुए कलाकार के भी पसीने छूट जायें इसे पकड़ने में ! मुझे तो जैसे बिन मांगे मोती मिल गया ! यह मेरी कविता !
अदा ! इससे पहले कि असली मुददे पर आया जाये, वो वारदात तो बतानी होगी, जिसने तेरी इस अदा को कैमरा दिया..खास कुछ नहीं, इंडिया मैच हार गया था उस दिन ! वही किरकट ! क्या होती है किरकट.. क्या होता है मैच ! मेरी जाने बला ! कौन जीतता है, कौन हारता है.. अपनी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता ! 
पर मुझे यह मैच रास आ गया..टकसाली चेहरों की भीड़ में यह अदा कहाँ से मिलती अगर इंडिया मैच न हारता !
हाय ! क्या संजीदा चेहरा और आँखों में लरजते हुए तूफ़ान ! नाक  की नोक पर सजा हुआ गुस्सा ! कसे होंट! पता नहीं कितनी-कितनी खट्टी मीठी गालियां चबाते हुए ! जैसे पता नही क्या हो गया है ! नहीं अदा तेरी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा रहा .. न ही कोई मजाक उड़ा रहा हूँ ..मैं तो सिर्फ उन खूबसूरत पलों को शब्द देने की कोशिश में हूँ जिसे उस कैमरा  कलाकार ने कैद किया है ! पर मुझे कुछ और भी कहना है.. हमारी यह राष्ट्र-भक्ति, हमारा यह भारत-प्रेम, यह जनू-ए-इंडिया ! क्रिकेट- प्रेम की झालर बन कर क्यों रह गया है ? इतनी संकुचित क्यों है हमारी दृष्टि, कि मात्र क्रिकेट मैच के हारने का यों मातम मनाया जाये ..?  क्या खेल को, खेल की भावना से नहीं लिया जाना चाहिए! बेशक, हम हारे, तभी तो दूसरा जीता! ..क्या हम अपनी हार को एक तरफ रख कर, दूसरे की जीत में शरीक नहीं हो सकते ? ..और जिसकी जीत में हम शरीक नहीं हो सकते उसके साथ हमें खेलना ही क्यों चाहिए ?

अद्वितीय

बुधवार, 26 जनवरी 2011


अद्वैत क्या है ? दो विपरीत अतियों का संगम .. जितना ताप, उतनी शीत; जितना प्रकाश, उतना ही अन्धकार; जब एक दूसरे में समा जाएँ तो परिणाम क्या है ? इसे आप कविता की भाषा में पूर्ण कह सकते हैं.. गणित की भाषा में शून्य! हाकिंस, एक तरफ व्यक्त ब्रह्म की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ  ईश्वर के अस्तित्व से इनकार कर रहे हैं, यद्यपि, उनका होना या मेरा या  आपका होना, ईश्वर  के होने का अकाट्य प्रमाण है..   वे  विज्ञान के नियमों को सर्वोपरी कह रहे हैं .. वे शुरुआत भौतिकी से नहीं मान रहे .. भौतिकी के नियमों से मान रहे हैं... उनकी भाषा में " ईश्वर यदि है तो विज्ञान के नियम हैं THE LAW ITSELF".. हमारे यहाँ भी तो ज्ञान को स्वयम्भू कहा गया है.. परमात्मा को ज्ञानस्वरूप ही कहा गया है ..हमारे यहाँ जिसे अव्यक्त ब्रह्म कहा गया है उसे वे black energy नाम दे रहे हैं ..इस BLACK ENERGY के बारे में कुछ कह भी नहीं पा रहे...लेकिन, जितना कुछ कह रहे हैं वह उन्हीं निष्कर्षो तक आ रहा है जिन्हें इस देश की मनीषा छू चुकी है..

उदास दिन की डायरी

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी

(पिछली सदी के अंतिम दशक में लिखे गए कुछ पन्ने)
फिर वजह-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबा किया हुए... ग़ालिब
इसे सनक कहूँ या मनोरोग, लिखने का शौक जनून की हदों को छूने लगा है . शांत साहब ने कहा भी था,'क्यों बर्बाद होना चाहते हो?' ..पता नहीं भीतर क्या हलचल है, लिखता हूँ फाड़ देता हूँ .
अग्निशेखर ने कहा था, 'लेखक बुनकर होता है, सम्पादक दर्जी, दोनों को एक साथ नहीं रहना चाहिए.' अपने भीतर तो दोनों एक साथ डटे हुए हैं . बेचारा कबीर, दिन भर में कुछ पंक्तियाँ बुनता है और मास्टर जी कैंची लेकर आ जाते है. मास्टर जी कुछ दिन जरा घूम फिर आइये...
मीना कुमारी की पंक्तियाँ याद आ रही है
जागी हुई आँखों में कांच से चुभते हुए ख़्वाब
रात ऐसे ही दीवानों की बसर हुआ करती है
दूर कुत्तों के भौंकने में गीदड़ों की हुआ हुआ में 'राग दूरदर्शन' रात के इस सन्नाटे में रंग भर रहे हैं
ए झूम जागना रात दा बहुत मंदा
या कोई जागदा  ए पहरे दार राती
या फिर जागदा ए दुखिया मरीज कोई
या फिर जागदा ए चोर चकार राती
या फिर जागदा ए इश्क दी रमज वाला
या फिर जागदा ए परवरदिगार राती
श्याम इनमें से तुम कौन जो इतनी रात गए  जाग रहे हो?        


बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -२

दुनिया होली खेल रही है ..मैं घर में उदास दुबका बैठा हूँ ..भीतर शायद कोई मकड़ी है जाले बुनती हुई . कितना काटूं; कितना साफ़ करूं ? मुझे मेरी आदतों ने मारा है . आस्थाएं भंग, विशवास गायब ! कारण खोजता हूँ तो बात पीढ़ियों तक जा पहुँचती है.
माँ याद आ रही है . चौथाई सदी पहले इसी दिन दुनिया से विदा हुई थी. अपने अक्खडपन में कितना दुखी किया था उसे . शायद उसी का फल है . सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं . शायद पूरा जीवन यूं ही चलेगा .
"शापित सा इस जीवन का मैं ले कंकाल भटकता हूँ
इसी खोखलेपन में जाने क्या खोजता अटकता हूँ .."---जयशंकर प्रसाद

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

एक उदास दिन की डायरी -३

सिर भारी है. नींद का हमला. फिर भी लिखना है ... क्या लिखूं ? मन के आकाश में कितने ही सपने पतंगों से उड़ते रहते हैं. आज शायद सब के सब हड़ताल पर हैं. मनुहार करके शेखर से "इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी" लाया हूँ. केवल कविताएँ पढ़ने के लिए. कुछेक पढीं, पर ऊब गया हूँ. मन एकाग्रता के मूड में नहीं. बच्चे वैष्णो देवी गए हैं. सिर सिरहाने की खोज में ...कलम कह रही है ...छोडो कल देखना . . . .  .
कल की ऊंघ में जो लिखा, देख रहा हूँ . ख़ारिज होने के लायक भी नहीं. जो लिखा गया ठीक ही है. कम से कम अभ्यास तो नहीं छूटा.
सोचता हूँ कुछ लोगों के लिए लिखना सांस लेने जितना सहज क्यों होता है ? मुझ जैसों के लिए, यह इतने अभ्यास का विषय क्यों है? तिस पर भी वह बात तो बनती ही नहीं ! सारे तीर नीमकश ही निकल जाते है ! जहां अभ्यास छूटा लिखना भूल गए ! लिखने के लिए भीतर एक छटपटाहट चाहिए ! एक ईमानदार बेचैनी ! विस्थापन के इन  वर्षों में यह बेचैनी, अपनी तेज़ी और प्रभाव खोने लगी है . विस्थापित जीवन ने हमारे साथ एक अच्छाई भी की है. हमारी दिमागी खाल कुछ और मोटी हो गई है.  छोटे छोटे कंकर पत्थर अब  बे असर ही निकल जाते हैं.. क्रमशः