सोमवार, 2 दिसंबर 2013

प्रिय दिव्या के लिए धन्यवाद के साथ

  "दिल में ऐसे उतर गया कोई 
जैसे अपने ही घर गया कोई
आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी 
मुझ से होकर गुजर गया कोई  
इतने खाए थे रात से धोखे 
चाँद निकला कि डर गया कोई"

(उपरोक्त पंक्तियाँ 
सूरजभानु गुप्त के काव्य-संकलन 
"एक हाथ की ताली" से हैं 
उनकी पुस्तक को पढ़ने के बाद 
मेरे उदगार इस प्रकार व्यक्त हुए) ---

"एक हाथ की ताली"
दी खुद को गाली
इत्ती देर से मिली 
यह कविता मतवाली 

मुझे शक है 
शहर की नीयत पर 

नहीं होती 
शहर में संवेदना 
इतनी गहरी 
कि 

हर भाव हर भंगिमा 
चुन ले 
अपने माप के शब्द 
और नाचने लगे

मुझे शक है कि  
यह कविता 
सूरजभान की हैं

नाम 
बेशक है उनका 
पर कविता गाँव की है 

... श्याम 

यह कवि था

कभी जब 
वह सुबह होगी
जिंदगी पुर-लुत्फ़ 
पुर-सकूं होगी
पलट कर एक बार 
कर लेना याद
कवि को भी

यह कवि था
जिसने भाव को ध्वनि दी
ध्वनि को शब्द दिए
शब्द को अलंकृत किया
तुम्हे भाषा दी

कल्पना करो
अपनी बात कहने के लिए
तुम्हारे पास मुहावरा ना होता
गीत न होते,  कविता न होती

तुम आज भी
कच्चे मांस के स्वाद से
आगे नहीं निकल पाते

गम

गम 
ऐसा तेज़ाब होता है 
दिल 
जिस्मों जां तक ही नहीं 
रूह तक का अज़ाब होता है 

गम के मारों के लिए 
पीना सवाब होता है

कामन वेल्थ

1.
जुबाँ की आँख नहीं 
आँख बे-जुबाँ मेरी 
कहूँ  तो किससे कहूँ 
क्या है दास्ताँ मेरी 
फलक ने खोल दिए राज़ सब 
जो पिन्हा थे 
कामन वेल्थ खेल 
और यह जाँ मेरी
 --श्याम 

2.
दांत बेचारे क्या करें 
कुछ फौजी हैं  कुछ गुन्डे हैं 
चबाते हैं 
हुकम बजा लाते हैं 

खतरनाक तो है  जुबाँ 
स्वादों की मारी 
दुखियारी 
सिर्फ हुक्म चलाती है 

दिल्ली को   
कामन वेल्थ 
बना  जाती  है


शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010

(:हँडल विद केयर:)

न उसे देखा था कभी
न सुना कभी
न कुछ लेना था उससे
न कुछ देना था उसे  

फिर भी उसकी याद
जैसे
गर्म दोजख दिनों में
बरसात की फुहार सी   
चूम गई है मुझे
अभी के अभी

यूं ही बैठे-ठाले 
सोचने लगा हूँ  
आखिर क्या हुआ था ऐसा  
हमारे बीच  
जो वह शोख कली यूं रूठ गई
पलट कर पूछा तक नहीं  
मरीजों का हाल  

जरूरी है
बहुत जरूरी है
कुछ चीज़ों कुछ रिश्तों पर
लिखा रहना
(:हँडल विद केयर:)

शायद यह देश ...


निकाल कर जंजीरों से

टांग दिया सलीब पर
अब किसी हथौड़े की चोट
किसी कील की चुभन
कोई असर नहीं करते

शायद यह देश ...

यह मेरा देश ..


मेरी आँखों में तो अब
पानी भी नहीं है ...

घुटन

मैं यूं ही 
कविता के पीछे 
क्यों पड़ा रहता हूँ 
क्या लेना-देना है 
मेरा कविता से 
न यह मेरे 
किसी बिल को 
भरने के काम आती है 
न किसी दफ्तर में कुर्सी दिलाती है 
बस 
 घोटती रहती है 
मेरी घुटन की भांग 
बारीक और बारीक 
कि
एक-एक परमाणु 
चिन्चियाने लगता है 
मुझे तो 
यह भी नहीं मालूम 
इतनी पिसी हुई
 घुटन को कहाँ फेंकू 
कैसे बचूं और बचाऊँ जग को 
इसके विकरण से