गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

हिंदी दिवस

मंगलवार, 7 सितम्बर 2010


पूछा कमाल पाशा नें
लगेगा कितना समय
जो बनाना हो तुर्की को राष्ट्र-भाषा
"दस बरस कम से कम"
कहा विशेषज्ञों ने
"तो समझ लो !
बीत चुके यह दस बरस -
तुर्की इस देश की राष्ट्र-भाषा है
ठीक इसी पल से ..."


पर अफ़सोस ! ओ हिंदी !
बीते इतने बरस
न मिला तुम्हें कोई कमाल पाशा ..!


शायद हम दौड़ते रहे सिर के बल
पैरों से सोचते रहे
और बनी रही तू
चिर-उपेक्षित परित्यक्ता सी
अपने ही देश में


ओ हिंदी ! मेरी मातृ-भाषा
आखिर क्या है खोट तुझमें
कि हम मनाते हैं हिंदी दिवस
जैसे पितृ-पक्ष में कोई श्राद्ध !!    श्याम जुनेजा

वह एक पल

मंगलवार, 28 सितम्बर 2010



वह एक पल
जब उस कलाकार ने तुम्हें 
कैमरे में उतारा होगा 
कितना कुछ तय कर गया 
मेरी मंजिलों-मुकाम का रुतबा 
तुमसे मेरा रिश्ता 
मेरी महबूब 

अखबार में छपी 
तेरी तस्वीर 
मैं तो देखूँगा तेरी तस्वीर 
और शब्दों को 
करने दूंगा अपना काम 
जिन्हें मैंने 
जन्मों से पाल रखा है 
मधु-मक्खियों और 
तितलियों की तरह 

कितनी मूंगफलियों का 
लिफाफा बनी होगी 
तेरी तस्वीर 
यह जो 
मेरे हिस्से में चली आयी है 
बनाएगी कितने लिफाफे 
मेरे दिल के 

ओ मरीचिका !

तुम्हें पुकारते हुए

बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010



तुम्हें पुकारते हुए 
जिनसे होती है मुलाक़ात 
वे मेरे दिल की तहों में छिपे राज़ हैं!

 या
 भीगने को बेताब मौसम में 
अबाबीलों के बच्चों की उड़ान! 

या
 दूर  किसी पहाड़ में बसे 
गाँव के लोगों के भोले डर 
जो शहरी उजालों से डरतें हैं !

तुम्हें करते हुए याद

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010


तुम्हें करते हुए याद 
मुझे लगता है डर
तेरी नींद में जाकर 
मेरी याद 
कोई बवाल न कर दे 

तुम कहीं भटक न जाओ 
किसी सपने के बेतरतीब 
डरावने 
और खूबसूरत जंगल में 

हमारे  बीच की यह दूरी 
किसी और यात्रा का 
रुख न कर ले 

डरता हूँ 
तुम्हें करते हुए याद

इश्क

मंगलवार, 2 नवम्बर 2010


मजाजी हो हकीकी हो 
इश्क तो इश्क है 
वे जो चिढते हैं इश्क से 
अगर देख पाते 
यह करिश्मा ..यह कायनात ..
यह सारे का सारा वजूद 
है किसी के इश्क का नजारा 
पर 
उन्होंने तो बाँध रक्खी हैं
आँखों पर पट्टियाँ  
हवा में भांजते फिरते हैं लाठियां 
शायद 
ये उनका शौक हो या पेशा 
हुआ करे 
मुझे क्या एतराज 
वे खंदके खोदें 
खाईयों को और चौड़ा करें 
झूठ और नफरत की आग में 
सडें लडें मरें 

मैं उन्हें रोकूँगा नहीं 
बस 
तौहीने इश्क न करें 
इस कुफ्र की 
कहीं कोई तौबा नहीं 

श्याम जुनेजा

किताबें

शनिवार, 25 सितम्बर 2010


कोई भी किताब आपको कुछ नहीं देती.. आप जो लेना चाहते हैं ले लेते हैं ... आप क्या लेना चाहते हैं; इस पर निर्भर करता है कि आपको क्या सिखाया गया है .. जब आप  इस सीखे हुए से मुक्त होकर, निष्पक्ष होकर, किताब से कुछ ले पाते हैं.. उतना ही आपका अपना होता है.. इसी के आधार पर आप में किताब-ऐ -जीस्त को पढ़ने की कुव्वत पैदा हो पाती है ... यह समझ लिया जाना चाहिए.. जिंदगी से बड़ी न कोई किताब थी, न है, न होगी ..जिसने जिंदगी की किताब नही पढ़ी, उसमे इबादत  की पात्रता भी विकसित नहीं हो पाती और यदि आपकी जिंदगी में  इबादत नहीं है तो वह मिटटी है..
अगर एक किताब अल्लाह के फरमान से है तो दुनिया की सारी किताबें भी अल्लाह के फरमान से हैं क्योंकि वह एक है और उसी के फरमान से सब होता है ..ये किताबें आपकी मदद के लिए हैं आप पर लादे  जाने   के लिए नहीं हैं 

अदा !

रविवार, 26 सितम्बर 2010


अदा ! हाँ.. यही पेज तो लेना है आज !  आज तो मुझे अपनी इसी दिलरुबा से बात करनी है !..वैसे, जब अखबार से यह तस्वीर उतारी थी, तब यह नहीं सोचा था की इस पर भी कभी कुछ  लिखूंगा ! बस खटक गया था कुछ भीतर.. शायद ! यह मेरी कविता है..!
बायीं हथेली पर धरी ठुड्डी .. मुड़ी हुई उंगलियाँ, बायीं गाल में धंसी हुई ! गिरती हुई बालों की लट, जैसे कश्मीर के रस्ते में नासरी-नाले के पास एक पतली सी जल-धारा.. एक ऊँचाई से गिरती हुई !
प्रसिद्ध फ़िल्मी हस्तियों के चेहरे, मेरे इसी काम तो आते हैं   मेरी इस अनाम गुड़िया-बेबी का चेहरा, जवानी में, फिल्म-अभिनेत्री राखी के मुहांदरे के आस-पास ठहरता है ..
चेहरों में मेरी दिलचस्पी ! आम सी बात है.. हम सब चेहरों में ही तो जीते हैं..जितने चेहरे बाहरी दुनिया में दिखते हैं; उसके दस गुणा तो हमारे भीतर टहलते रहते हैं ! इस चेहरे का तो मुझे नाम भी नहीं मालूम .. पर खास बात .. यह अदा ! कुशल से कुशल निर्देशक और मंझे हुए कलाकार के भी पसीने छूट जायें इसे पकड़ने में ! मुझे तो जैसे बिन मांगे मोती मिल गया ! यह मेरी कविता !
अदा ! इससे पहले कि असली मुददे पर आया जाये, वो वारदात तो बतानी होगी, जिसने तेरी इस अदा को कैमरा दिया..खास कुछ नहीं, इंडिया मैच हार गया था उस दिन ! वही किरकट ! क्या होती है किरकट.. क्या होता है मैच ! मेरी जाने बला ! कौन जीतता है, कौन हारता है.. अपनी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता ! 
पर मुझे यह मैच रास आ गया..टकसाली चेहरों की भीड़ में यह अदा कहाँ से मिलती अगर इंडिया मैच न हारता !
हाय ! क्या संजीदा चेहरा और आँखों में लरजते हुए तूफ़ान ! नाक  की नोक पर सजा हुआ गुस्सा ! कसे होंट! पता नहीं कितनी-कितनी खट्टी मीठी गालियां चबाते हुए ! जैसे पता नही क्या हो गया है ! नहीं अदा तेरी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा रहा .. न ही कोई मजाक उड़ा रहा हूँ ..मैं तो सिर्फ उन खूबसूरत पलों को शब्द देने की कोशिश में हूँ जिसे उस कैमरा  कलाकार ने कैद किया है ! पर मुझे कुछ और भी कहना है.. हमारी यह राष्ट्र-भक्ति, हमारा यह भारत-प्रेम, यह जनू-ए-इंडिया ! क्रिकेट- प्रेम की झालर बन कर क्यों रह गया है ? इतनी संकुचित क्यों है हमारी दृष्टि, कि मात्र क्रिकेट मैच के हारने का यों मातम मनाया जाये ..?  क्या खेल को, खेल की भावना से नहीं लिया जाना चाहिए! बेशक, हम हारे, तभी तो दूसरा जीता! ..क्या हम अपनी हार को एक तरफ रख कर, दूसरे की जीत में शरीक नहीं हो सकते ? ..और जिसकी जीत में हम शरीक नहीं हो सकते उसके साथ हमें खेलना ही क्यों चाहिए ?