गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

घुमई



अभिनव थियेटर जम्मू,  बलवंत ठाकुर का लिखा व निर्देशित डोगरी नाटक घुमई’.. जुबां की आंख नही आंख बेजुबां मेरी .. श्री ठाकुर और उनकी टीम को बधाई।
कुछ अच्छा लगे तो एक क्योंभी जाग जाती है। घुमईकी क्योंमें पहला आकर्षण पहाड़है। विस्थापन के चलते पिछले वर्षों में, पहाड़ को न जी पाने की कचोट,  इस आकर्षण को घना करती गई... इसी कारण अपने लिखने में पहाड़ को कई अर्थों में खुला पाता हूं। घुमईने इन अर्थों को नए आयाम दिए हैं।
कहानी में पहाड़ी लोक जीवन के यथार्थ की प्रस्तुति में एक हल्की सी विसंगति दिखी। शायद, मेरी नज़र का धोखा हो... पहाड़ी जीवन के अपने समृद्ध व संचित अनुभव हैं। जिनके चलते वे अपनी जरूरतों और पहाड़ के व्याकरण में सामंजस्य बिठा कर ही जीवन जीते हैं। ..अपवाद रूप, कभी हो सकता है ..ऐसी महत्वपूर्ण यात्रा जिसमें दुल्हन घर लाई जा रही हो... उसमें पानी के प्रबंध की चूक हो गई हो।
कुछ भी हो, नाटककार ने प्यास,  पहाड़ और आदमी के त्रिकोण से कुछ ऐसा रचा है, जो गहरे में चुमता है।
प्यास तो नैसर्गिक है,  इसे कहां तक रोकिएगा ..पहाड़ की जटिलता,  आदमी की विवशता ...युधिष्ठर भी द्रौपदी हार जाते हैं। ...यह तो सीधा-सादा भोला सा पहाडी़ दूल्हा है। विवशता से उपजी चूक,  चूक से उपजी विवशता,  उस त्याग को भी तो संकेतित करती है, जो इस प्यास की निवृति में किसी भी सीमा तक जाने को उद्यत है...। दुल्हन की प्यास मिटे,  इसके एवज में,  दुल्हन ही देने को तैयार हो गया।

लेकिन,  इस सारी स्थिति से उपजी प्रयत्न की बाध्यता,  सहज मानवीय करूणा से प्रेरित कर्म को लांघ कर परिणाम प्रेरित जुआ क्यों बनी?  उस युवक के साहस,  पहाड़ और प्यास से जा टकराने के साहस को, (यह भी ध्यान में रखते हुए कि उसकी शारीरिक  क्षमता दूल्हे से बेहतर रही होगी) कम करके नही आंक रहा ...इसके मूल में निश्चित ही सहज मानवीय करूणा की प्रेरणा है। लेकिन, जब इसमें  व्यक्तिगत स्वार्थ की फलाकांक्षा; दुल्हन को प्राप्त कर लेने का स्वार्थ जुड़ा, तो इस प्रेरणा का सौंदर्य,  उसका प्रभाव तो धूमिल हुआ...!

मान लो, पानी लेकर आनेवाला पात्र नही मरता.. तब क्या स्थिति थी ?
जटिल है....जटिल है कोई निर्णय दे पाना ! शायद,  इस जटिलता से बचने के प्रयास में, नायक को मृत्युदान दे दिया गया है।
जो भी हो, कहानी में एक मौसम है, जो कभी भी, किसी भी करवट निर्णय ले सकता है...यही इसका सौंदर्य है।
वैसे भी नाटक में घटनाएं रसरंग से सराबोर है। नाटक का निर्देशन कमाल का था। अमूर्त का मूर्तन, निर्देशन में विलक्षण प्रतिभा की मांग करता है। विश्वास ही नही होता, जम्मू में ठीक हमारे बीच, ऐसी विलक्षण प्रतिभा भी है! लगता है जैसे निर्देशक,  इंच-इंच कहानी को जिया हो। एक-एक अभिव्यक्ति इतनी सघन, इतनी सूक्ष्म, इतनी सशक्त,  इतना तरंगित करनेवाली .. प्यास जैसे सजीव हो उठी। दुल्हन प्यास हो उठी, दूल्हा प्यास हो गया, बराती-कहार, पहाड़, सब प्यास हो गए। यहां तक की दर्शक प्यास हो गया। प्यास और उसकी तृप्ति की आकांक्षा लहराती हुई दर्शक के भीतर तक उतर गई। दर्शक बिना चाहे भी इस प्यास के साथ एकात्म हो उठता है।

मेरे सामने तो कंडी सजीव हो उठी। एक पहाड़न, अपने गधे के दोनों और दो मिल्ट्री कैन लटकाए, अपने दो बच्चों के साथ पहाड़ी उतर रही हैं;  तीन चार घंटे का सफर तय करते हुए चालीस लीटर पानी घर ले जा रही है। शुआपाटा, दब्बड, भेड़ा,  कंडी के गावों में आज भी यह दृश्य मिलते हैं। बेशक, राज्य के पेयजल विकास मंत्री अपने नाम के साथ सागरचिपका कर रखते हों। पर मैं तो अपने नाम से सागरहटा रहा हूँ  (चिढ़ होने लगी है) ...विचलन के लिए क्षमा, पर जरूरी लगा यह सब कहना।
मंच का प्रकाश प्रबंध अद्भुत था... दिन सांझ में सरकता हुआ, सांझ रात में ढलती हुई ..रात फिर सूरज को खाली मटके सा सिर पर रख कर मूर्त प्यास के इस अंतहीन सफर को तय करती हुई। ....और वो डुग्गर गीतों का पार्श्व-गायन, शब्द; अर्थो की सारी सीमाएं लांघ, लहर बन छाए रहे ... हर पात्र .. हर पात्र अपना प्रभाव दे गया।
पहले लगा नाटक का अंत कुछ अस्वाभाविक  है। फिर लगा हम जो जीवन जीते है उसमें स्वाभाविकता है ही कहां ? शायद पृष्ठभूमि पहाड़ की न होती तो नायिका के विद्रोह का कोई अर्थ था। लेकिन, पहाड़ की पृष्ठभूमि में नायिका का विद्रोह ? 
फिर भी कहूंगा ...जुबां की आंख नहीं आंख बे जुबां मेरी

सोमवार, 29 सितंबर 2014

तुलती है हरेक चीज़

तुलती है हरेक चीज़ दुनिया की तुला में
महबूब बसा दिल में मगर तोला नहीं जाता
गुणगान तेरा अक्सर किया करते हैं शबनम
सच यह है कि सच हमसे मगर बोला नहीं जाता

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

फासले

मछली जल में जन्म लेती है
जल से बाहर मर जाती है
आदमी झूठ में जन्म लेता है
झूठ से बाहर मर जाता है

पर कविता
सच में जन्मती है
सच के लिए धडकती है

शायद इसीलिए
आदमी और कविता  में
फासले.. और फासले..
और और फासले बचे रहते हैं !

उमस

बुधवार, अक्तूबर 21, 2009

(रचनाकार महाराज कृष्ण सन्तोषी)

महाशय
आप पूछ सकते हैं
जब उमस हो
तो तैमूर को
याद करने में क्या तुक


पहाड़ बर्फ नदियाँ
स्मृतियों में इनका आना
स्वाभाविक है
पर उमस में जाग जाना
इतिहास बोध
सचमुच हैरान कर देने वाला है


महाशय आप और कुछ न पूछें
सिर्फ़ सुनें

दरअसल
हमारे यहाँ जब बच्चों को
daant पड़ती थी
तो बुजुर्ग उनसे यह कहते थे
जा तुझे देखने पड़ें
उमस भरे दिन

इस daant में
हमारे इतिहास का वह दस्तावेज़ है
जो हमारी ही सांसों में
खुलता बंद होता है


महाशय
आप विश्वास करें न करें
पर जब उमस badti है
समय बैचैनी से कटने लगता है
हमें अपना इतिहास याद आता है

सात सौ साल पहले
तैमूर के डर से
भाग आए थे
हमारी धरती पर सात सौ घुड़सवार
और उन डरे हुए
सात सौ घुड़सवारों के डर से
सात लाख इंसानी शक्लें
कब से भटकती फ़िर रही हैं
यहाँ वहां
पसीने स लथपथ


महाशय
आप जिसे उमस कहते हैं
हमारे लिए उसका सम्बन्ध
समंदर से नहीं
तैमूर के आतंक से है ... 

मैं समुद्र ही हो सकता था

बृहस्पतिवार, अक्तूबर 22, 2009


मैं समुद्र ही हो सकता था
कि प्रत्येक धारा ने
मुझ ही में समाना है
मुझ ही से पाना है
अपने प्रवाह का बल

अपार है मेरी कड़वाहटों का विस्तार
पर अथाह है मेरी प्रतिबद्दता

आओ तमतमाई हुई झुलसी हवाओं
मुझ से लो जितनी चाहो उतनी नमी

शिखरों को विशुद्द सत्व से
धवल करो
तराई मैदानों में भरो इन्द्रधनुषी रंग

अरे मेरी चिंता न करो
मेरा गौरव मेरी व्यथाओं में सुरक्षित है.

वक्त

रविवार, दिसम्बर 27, 2009


वक्त
जेब कतरा वक्त
न जाने 
कब से लगा था पीछे
और अचानक . .
 सब खो गया

किस थाने .. 
करूं शिकायत 
अपनी ही बेख्याली का
आता है रोना

क्यों चला आया
चेहरों पर चढ़े चेहरे
इस शहर को देखने
रखा ही क्या था यहाँ

हर आस नकली
 हर सपना झूठा

वक्त जेबकतरा 
हाकिम इस शहर का..

बर्फ


बर्फ  जो  हर  साल
किसी दोस्त  सी उतरती थी
कहवों और कह्कहों  के बीच
इक शाने बे नियाजी के साथ
सेबों को बाँटती लालिमा
धान को जीवन के गीत
इस बार गिरी थी किसी लेनदार सी

जैसे आडिट की कोई
मुहीम चली थी आसमानों  में

जैसे पूछ रही थी
मेरी इस घाटी को रक्तरंजित करने का
मेरे ही बन्दों को बेघर
दरबदर करने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया था

बर्फ जो गिरी थी इस बार
जैसे पहाड़ों के पास अपने
दाग धोने के लिए भी  बचा नहीं  था पानी

बर्फ जो हर बार
किसी दोस्त सी उतरती थी
इक शाने बे नियाजी के साथ
इस बार गिरी थी किसी लेनदार  सी

सन्दर्भ :- कश्मीर से विस्थापन के बाद किसी एक साल बर्फ ने अपना तांडव दिखाया  था  कश्मीर में

एक छोटे से कवि की छोटी छोटी बातें

सोमवार, दिसम्बर 28, 2009


एक
हर  कोई
स्वयं  को  खास  ही समझता है
फिर वह  आम आदमी कहाँ है
जिसकी हम चर्चा करते हैं

दो
तुमसे मिल नहीं पाता
बिना किसी रिश्ते की आड़ के
तुमसे मिलना चाहता हूँ
बिना किसी रिश्ते की आड़ के

तीन
जितना जमा किया हमने
तिजोरियों में सोना
उतने ही थमाए हथियार
वानरों  के   हाथ
अब किसलिए
किस बात का रोना धोना

चार
सिर्फ एक परिवर्तन हुआ है
अहिंसा से  अ  निकल कर
सत्य से जुड़ गया है

पांच 
दुनिया  का सबसे जागा हुआ आदमी था कुम्भकरण  

छ 
प्यास नहीं पूछती
पानी का धरम पानी की जात
प्यास प्यास होती है
पानी! पानी
एक दूजे के लिए

जिनका कोई शीर्षक नहीं होता

मंगलवार, दिसम्बर 29, 2009


जिनका  कोई  शीर्षक  नहीं  होता
मैं  ऐसी   ही  भटकी  हुई  कविताओं  का  कवि  हूँ

मेरी  कविताओं  की  वेश  भूषा
जिक्र  मत  करो  
उनके  बालों  को
कंघी  भी  नसीब  नहीं  होती
वह  तो  बस  तडके  उठती  हैं
कुछ  बचा  खुचा  मिला  खा  लेती  हैं
अक्सर  भूखी  ही
निकल  पड़ती  हैं  काम  पर

काम  उनका  क्या
खाली  बोरों  में  इधर  उधर  की  खबरें
कुछ  फेंके  गये  प्लास्टिक  शब्द

उनके  हाथ  में  एक  छड  भी  होती  है
जिसके  सिरे  पर
मिकनातीस  का  टुकड़ा   लगा  रहता  है
रास्ते  के  कील  कांटे
साफ  करती  हैं  मेरी  कविताएँ

मेरी  कविताएँ  स्कूल  नहीं  जातीं
बक्सा  वैनों   में  बैठ  कर
उन्हें  फुर्सत  ही  नहीं  मिलती
इतना काम  है  उनके  पास

सिर   पर  उठाये आसमान
व्यर्थ  से  अर्थ   छानती   हैं  मेरी   कविताएँ..

सिलवटें

बुधवार, दिसम्बर 30, 2009


सिलवटें
यों मेरे पैराहन में न देख
मैं समुद्र सा
बड़ी दूर तक फैला हूँ दोस्त!

पथ भुजंग

रविवार, जनवरी 03, 2010


पथ भुजंग
पाथेय विष
कैसे आऊँ तुम तक
अमा निशा गिरि  उतंग
पथ भुजंग!

इससे पहले कि


इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

इससे पहले कि वे तुम्हें
टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमो में

इससे पहले कि
तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ
गिद्ध बुनने लगें दावतें

इससे पहले कि
इतिहास तुम्हें मुहर बंद कर दे

उठो!
तोडो अपनी यह
सदियों लंबी आत्मघाती नींद

साधो!
असंभव की छाती पर
संभावनाओं की लय ताल

कसो!
बुद्धि की प्रत्यंचा
करो  लक्ष्य वेध
छीन लो अपना स्वत्व

इससे पहले कि
हो चुकी हो बहुत देर

यह स्वत्व क्या है इस पर सबके विचार आमंत्रित हैं

ईश्वर

बृहस्पतिवार, जनवरी 07, 2010


जिन्होनें कहा
ईश्वर प्रकाश  है
उन्होनें यह न कहा
कितने गहन अंधेरों से भिड कर
उपजा यह प्रकाश

उन्होनें यह न कहा
न होने के विरोध में
होने की यात्रा है ईश्वर

उन्होनें यह भी  न कहा
ईश्वर अथक  प्रयोगधर्मिता  है
और हर ठहराव
ईश्वर के खिलाफ जाता है

मैं एक साथ


मैं एक साथ
कितने कितने लोगों से करना चाहता हूँ बात
कुछ रिश्ते जो टूट चुके
कुछ टूटने के कगार पर
कुछ दोस्त जो चाहते उनके खेमे की भाषा बनूँ
कुछ ऐसे जो
मुझ ही में तलाशते अपना बयान
हर आँख इक कुँआ
पता नहीं दर्द के किस समुद्र में खुलता है
मैं डूबना चाहता हूँ हर आँख में
गिने चुने घूंटों में पी जाना चाहता हूँ समुद्र
मैं कितने कितने लोगों से
करना चाहता हूँ बात एक साथ

यह जो

सोमवार, जनवरी 11, 2010


यह जो
डरा डरा खोया सा
कुछ न कुछ
पाने की चाह में मारा मारा
अदृश्य रस्सियों में बंधा
सोचता ही रहता
कुछ न कुछ
हर समय

यह जो
कदम भर भी
चल नहीं पाता
और नाप आता है
ब्रह्मांडीय  दूरियां  
देख नहीं पाता कुछ भी
सजाता रहता
ध्वनियों  की
चित्रों की
शब्दों  की दुनिया

यह जो .. .. ..

प्यार और नफरत

रविवार, जनवरी 17, 2010


प्यार के बदले प्यार
सब करते हैं

नफरत के बदले नफरत
सब करते हैं

प्यार के बदले नफरत
कोई विरला ही करता है
जैसे तू

नफरत के बदले प्यार
विरलों में कोई विरला
जैसे मैं

गीत


मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

भले ही उम्र अब मेरी जवां नहीं
भले ही दिल में वलवले तूफां नहीं
हैं आरजू के खंडहर हर तरफ
भले ही सर पे छत नहीं मकां नहीं
नहीं हैं पस्त हौसले मेरे अभी
भले ही मेरे मुह में जुबां नहीं

मैं ईंट ईंट बीन कर वक्त की
नई सदी को सच की राह मोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं पर्वतों को लाँघ छोड़ आया हूँ
मैं दलदलों को नापतोल आया हूँ
हूँ रास्तों की मुश्किलों से बाखबर
मैं रास्तों को मंजिलों से जोडूंगा
मेरी डगर मेरा सफर तेरे लिए
मैं टूटते दिलों को फ़िर से जोडूंगा

मैं जिंदगी से मुह कभी न मोडूँगा
न डर के हादसों से राह छोडूंगा

मार्तंड कुण्ड

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009


तुझे याद करते हुए
लिखना चाहता हूँ एक अर्थमुक्त कविता
सिर धुनते रहें शब्द पकड़ने वाले
अर्थ उनके हाथ से फिसल फिसल जाएं
मार्तंड कुण्ड की मछलियों की तरह
मैने तो समुद्र खंगाले हैं
मुश्किलन बचा हूँ
शार्कों व्हेलों का निवाला बनने से
फिर मुझे यह मार्तंड कुण्ड
क्यों याद आते हो मार्तंड ! विस्थापन में
तेरा प्रतिनिधि मेरा मित्र कवि
है तो सही मेरे संग यहाँ मेरे पास
तेरे जल में किलोलती मछलियों सी उसकी कवितायें
कहीं भी रहूँ समुद्रों में
पर्वतों पर
आसमानों में
तेरे कुण्ड की मछलियाँ और
उसकी कवितायें मुझे खींच लाती हैं जमीन पर
आज तो बस जी चाहता है
जो जी में आये लिखता चलूँ
कोई पराकाष्ठा छू लूं
यह भी क्या
हर बार लिखते रहें हम
सोची समझी साजिशों सी कवितायेँ!

नदी

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009


नदी मैं जानता हूँ
बूँद बूँद पहाड़ सा दर्द
जब रिसता है
तुम लेती हो जन्म

जानता हूँ
पत्थरों की पछाड़ से
चट्टानों की कोख से
उगाहते हुए
पहाड़ की मिटटी का कुअरापन
कैसे निकलती फलांगती
अल्हड सी गुजरती हो
धरती के घावों पर रखती मरहम

लेकिन नदी
कैसा लगता है
किसी खूंखार मोड़ पर
सभ्यता की कत्लगाहों से
और कत्लगाहों की सभ्यता से
निकले रक्त का
तुझमें आ मिलना !

कैसी लगती है
अपने भीतर मचलती
मछलियों की अपमृत्यु

कैसा लगता है
धरती का पाप गरल धोना
और समुद्र भर रोना

सच कहना नदी ॥ .

हे गणेश जी सबसे पहले आप ही की पूजा क्यों ?

शुक्रवार, 3 सितम्बर 2010


हाँ  बच्चा! सबसे पहले मेरी ही पूजा होनी चाहिए.. क्योंकि, मैं गणित का देवता हूँ  .. गणित का मायना समझते हो बच्चा! ..योजना बनाना  ! किसी भी काम को करने से पहले योजना बना लेना ही मेरी पूजा है, फिर उस काम में सफल होने के अधिक अवसर होते हैं ... देखो मेरा आकार प्रकार हाथी जैसा, लेकिन, वाहन चूहे ! जानते हो क्यों ?
क्योंकि योजना का आकार प्रकार तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन, उसे पूरा करने का काम तो छोटे छोटे लोग ही करते हैं ना! इसीलिए मुझे ॠद्धि सिद्धि का देवता कहा गया है.. और कार्य योजना भी जब बनाओ तो मुदित-मन से बनाना ..यही मेरा मोदक-प्रिय होने का रहस्य है
 .. अच्छा तो इस ब्लॉग के लिए तुमने कोई योजना बनाई है ?
.. अभी तो नहीं देव ..
.. तो चलो सबसे पहले यही काम करो ...कब, क्यों, कैसे, कहाँ.. सारे "क" वाले प्रश्न ले आओ  ..जहां मुश्किल आये तो मुझसे पूछना ..भला !
जैसी आज्ञा  देव...