बुधवार, अक्तूबर 21, 2009
(रचनाकार महाराज कृष्ण सन्तोषी)
आप पूछ सकते हैं
जब उमस हो
तो तैमूर को
याद करने में क्या तुक
पहाड़ बर्फ नदियाँ
स्मृतियों में इनका आना
स्वाभाविक है
पर उमस में जाग जाना
इतिहास बोध
सचमुच हैरान कर देने वाला है
महाशय आप और कुछ न पूछें
सिर्फ़ सुनें
दरअसल
हमारे यहाँ जब बच्चों को
daant पड़ती थी
तो बुजुर्ग उनसे यह कहते थे
जा तुझे देखने पड़ें
उमस भरे दिन
इस daant में
हमारे इतिहास का वह दस्तावेज़ है
जो हमारी ही सांसों में
खुलता बंद होता है
महाशय
आप विश्वास करें न करें
पर जब उमस badti है
समय बैचैनी से कटने लगता है
हमें अपना इतिहास याद आता है
सात सौ साल पहले
तैमूर के डर से
भाग आए थे
हमारी धरती पर सात सौ घुड़सवार
और उन डरे हुए
सात सौ घुड़सवारों के डर से
सात लाख इंसानी शक्लें
कब से भटकती फ़िर रही हैं
यहाँ वहां
पसीने स लथपथ
महाशय
आप जिसे उमस कहते हैं
हमारे लिए उसका सम्बन्ध
समंदर से नहीं
तैमूर के आतंक से है ...
यह रचना मेरे मित्र महाराज कृष्ण संतोषी की है !
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