गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मैं समुद्र ही हो सकता था

बृहस्पतिवार, अक्तूबर 22, 2009


मैं समुद्र ही हो सकता था
कि प्रत्येक धारा ने
मुझ ही में समाना है
मुझ ही से पाना है
अपने प्रवाह का बल

अपार है मेरी कड़वाहटों का विस्तार
पर अथाह है मेरी प्रतिबद्दता

आओ तमतमाई हुई झुलसी हवाओं
मुझ से लो जितनी चाहो उतनी नमी

शिखरों को विशुद्द सत्व से
धवल करो
तराई मैदानों में भरो इन्द्रधनुषी रंग

अरे मेरी चिंता न करो
मेरा गौरव मेरी व्यथाओं में सुरक्षित है.

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